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विजय मल्होत्रा ने झेला विभाजन का दौर… बीजेपी के दिग्गज नेता को PM मोदी ने ऐसे किया याद


विजय कुमार मल्होत्रा जी का निधन हो गया। वे भाजपा के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने आरएसएस और जनसंघ में राष्ट्रसेवा की। दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर का पद संभाला। आपातकाल विरोधी आंदोलन में भाग लिया। 1999 में डॉ. मनमोहन सिंह को हराया। वे शिक्षाविद और तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष भी थे। उन्होंने कई संस्थाएं स्थापित कीं।
कुछ दिन पहले, भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक, विजय कुमार मल्होत्रा जी को खो दिया। उन्होंने अपने जीवन में बहुत-सी के उपलब्धियां हासिल की। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने कठोर परिश्रम, दृढ़ निश्चय और सेवा से भरा जीवन जिया।
आरएसएस के क्या हैं मूल संस्कार – उनके जीवन को देखकर समझा जा सकता है कि आरएसएस, जनसंघ और बीजेपी के मूल संस्कार क्या हैं। विपरीत परिस्थितियों में साहस का प्रदर्शन, स्वयं से ऊपर सेवा भावना, साथ ही राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, यह उनके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी पहचान रही।
विभाजन का भयावह दौर झेला – वीके मल्होत्रा के परिवार ने विभाजन का भयावह दौर झेला। उस आघात और विस्थापन ने उन्हें कड़वा या आत्मकेंद्रित नहीं बनाया। इसके बजाए, उन्होंने स्वयं को दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हें आरएसएस और जनसंघ की विचारधारा में राष्ट्रसेवा का रास्ता नजर आया। बंटवारे का वो समय बहुत चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने सामाजिक कार्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
हजारों विस्थापित परिवारों की मदद – उन्होंने उन हजारों विस्थापित परिवारों की मदद की, जिन्होंने सब कुछ खो दिया था। उनका जीवन संवारने और उन्हें फिर से खड़े होने में मदद की। यही जनसंघ की प्रेरणा थी। उन दिनों उनके साथी मदनलाल खुराना जी और केदारनाथ साहनी भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में शामिल होते थे। उन लोगों की निस्वार्थ सेवा को आज भी दिल्ली के लोग याद करते हैं।
लोगों से के मुद्दों पर किया फोकस – 1967 के लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव तब अपराजेय मानी जाने वाली कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले रहे थे। इसकी बहुत चर्चा होती है, लेकिन एक कम चर्चित चुनाव भी हुआ। वो था, दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल का पहला चुनाव। राष्ट्रीय राजधानी में जनसंघ ने शानदार जीत दर्ज की। आडवाणी काउंसिल के चेयरमैन बने और मल्होत्रा जी को चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर की जिम्मेदारी दी गई, जो मुख्यमंत्री के लगभग बराबर का पद था। तब उनकी उम्र केवल 36 वर्ष थी। उन्होंने अपने कार्यकाल को दिल्ली की जरूरतों, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों से जुड़े मुद्दों पर फोकस किया।