
पुराणों के अनुसार देव प्रबोधनी एकादशी का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि इस दिन चार महीने के बाद भगवान योग निद्रा से जागते हैं। नारद जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे, उन्होंने हरि प्रबोधिनी एकादशी उपवास के बारे में जानना चाहा तो ब्रह्मा जी ने कहा कि मेरू और मंदराचल के समान भारी पाप भी इस व्रत से नष्ट हो जाते हैं तथा अनेक जन्म में किए हुए पाप समूह क्षणभर में भस्म हो जाते हैं। जिस प्रकार रूई के बड़े ढेर को अग्नि की छोटी-सी चिंगारी पल भर में भस्म कर देती है। विधिपूर्वक किया थोड़ा-सा पुण्य कर्म बहुत फल देता है परंतु विधि रहित अधिक किया जाए तो उसका कोई फल नहीं मिलता। संध्या न करने वाले, नास्तिक, वेद निंदक, धर्म शास्त्र को दूषित करने वाले, पाप कर्मों में सदैव रत रहने वाले, धोखा देने वाले, परस्त्री गमन करने वाले ये सब पापात्मा हैं।
जो इस एकादशी के व्रत करने का संकल्प मात्र करते हैं उनके 100 जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन रात्रि जागरण से उनकी आने वाली पीढिय़ां स्वर्ग को जाती हैं। नरक के दुखों से छूटकर प्रसन्नता से सुसज्जित होकर वे विष्णु लोक को जाते हैं। जो फल भूमिदान करने से होता है वही फल इस एकादशी की रात्रि जागरण से मिलता है।
यह एकादशी विष्णु को अत्यंत प्रिय, मोक्ष के द्वार को बतलाने वाली और उसके तत्व का ज्ञान देने वाली है। मन, कर्म, वचन से जो भी पाप हो जाए इस एकादशी के रात्रि जागरण से नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी के रात्रि जागरण से चंद्र, सूर्य ग्रहण के समय स्नान करने से हजार गुणा अधिक फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास में जो भगवान विष्णु की कथा का एक या आधा श्लोक भी पढ़ते या सुनते हैं उनको 100 गायों के दान के बराबर फल मिलता है।
पौराणिक कथानुसार भगवान विष्णु को चार मास की योग निद्रा से जगाने के लिए घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के साथ यह श्लोक पढ़कर जगाया जाता है-
‘उत्तिष्ठोतिष्ठ गोविंद त्यजनिद्रांजगत्पते।
त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिंदभवेत्।।
उत्तिष्ठोतिष्ठवाराह दंष्ट वेद्वत वसुंधरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमंगलम्कुरू।।’
यदि संस्कृत में इस श्लोक को पढऩे में कठिनाई हो तो-उठो देवा, बैठो देवा कहकर श्रीनारायण को उठाया जाता है।
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