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लघु कथा : त्राहि-त्राहि – इंसान

skulls

समूचा जन-समुदाय कलियुग की आपदायें सहता हुआ त्राहि-त्राहि कर रहा था। जन-समुदाय की करुण पुकार पर आसमान में एक छवि अंकित हुई और आकाशवाणी हुई-

‘‘तुम लोग कौन?’’

एक छोटे से समूह से आवाज उभरी-‘‘हिन्दू।’’

और आसमान से एक हाथ ने आकर उस हिन्दू समुदाय को आपदाओं से मुक्त कर दिया। अभी भी कुछ लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे। पुनः आकाशवाणी हुई-

‘‘तुम लोग कौन?’’

शेष जन-समूह के एक छोटे से भाग से स्वर उभरा-‘‘मुसलमान।’’

पुनः एक हाथ ने मुस्लिम समुदाय को भी आपदाओं से बचा लिया। अभी भी कुछ लोग शेष थे। पुनः वही प्रश्न गूँजा-

‘‘तुम लोग कौन?’’

भीड़ का एक छोटा सा हिस्सा चिल्लाया-‘‘ईसाई।’’

एक और हाथ ने उस समूह का भी भला किया। प्रश्न उभरते रहे, उत्तर गूँजते रहे, हाथ आते रहे, लोग बचते रहे। आसमान से फिर वही प्रश्न उभरा-

‘‘तुम लोग कौन?’’

अबकी बहुत थोड़े से बचे लोगों की आवाज सुनाई दी-‘‘इन्सान।’’

इस समूह को बचाने कोई भी हाथ नहीं आया। आसमान पर उभरी वह छवि भी लुप्त हो गई और ‘इन्सान’ इसी तरह त्राहि-त्राहि करता रहा।

  • अज्ञात 

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