
अमेरिका का यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब रूस और यूक्रेन जैसे देश सालाना लाखों ड्रोन बना रहे हैं। रूस इस साल करीब 40 लाख ड्रोन बनाने जा रहा है, जबकि यूक्रेन ने थोड़ा और आगे बढ़कर करीब 45 लाख ड्रोन बना रहा है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि ड्रोन, युद्ध की दिशा और दशा तय करने लगे हैं और अमेरिका पीछे नहीं रहना चाहता।
अमेरिका ने अपनी डिफेंस स्ट्रैटजी में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए सस्ते हथियारों के निर्माण की दिशा में काम करने का फैसला किया है। अमेरिकी हथियार काफी महंगे होते हैं, जबकि चीन और रूस काफी कम कीमत पर हथियारों का निर्माण करते हैं, भले ही अमेरिकी हथियारों के मुकाबले उनकी टेक्नोलॉजी कमजोर ही क्यों ना हो। ऐसे में अमेरिका ने रक्षा रणनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए ड्रोन को अब हाई-टेक हवाई जहाज नहीं, बल्कि बंदूकों में इस्तेमाल होने वाले “बुलेट” की तरह देखने का फैसला किया है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने एक महत्वपूर्ण मेमो पर हस्ताक्षर करते हुए साफ किया है, कि अब से ड्रोन डेवलपमेंट, खरीद और तैनाती में किसी भी तरह की देरी या नौकरशाही अड़चन बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अमेरिका की युद्ध नीति में ये बदलाव चीन और रूस के मॉडर्न हथियारों को देखते हुए लिया गया है। खासकर आधुनिक युद्ध में ड्रोन का काफी घातक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। चाहे भारत पाकिस्तान के बीच हालिया संघर्ष हो या फिर इजरायल-ईरान युद्ध या फिर रूस-यूक्रेन युद्ध… इन संघर्षों ने दिखाया है कि जिसके पास अत्याधुनिक ड्रोन हैं, वो बढ़त ले सकता है। भारत ने लाहौर में रडार सिस्टम को ड्रोन हमले से ही ध्वस्त किया था, जबकि यूक्रेन ने ड्रोन हमले में रूस को दहलाते हुए दर्जन भर लड़ाकू विमानों और बॉम्बर्स को ही तबाह कर दिया था। ऐसे में अमेरिका ने अब महंगे ड्रोन की जगह सस्ते ड्रोन बनाने का फैसला किया है।
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