
पाकिस्तान को आज वही सांप डंस रहा है, जिसे दशकों से पाकिस्तान ने पाल पोसकर लगातार जहरीला ही बनाया है। इस्लामाबाद ने 1990 के दशक से तालिबान को क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। भारत को चोट पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान को स्ट्रैटजिक डेप्थ बनाने की कोशिश की।
पिछले कुछ महीनों से तालिबान और पाकिस्तान एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके हैं। कतर में शांति समझौते पर सहमति मिलने के बाद ही अफगानिस्तान की तालिबान सेना के चीफ ऑफ स्टाफ फसीहुद्दीन फितरत ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान फिर हमला करता है, तो वो जड़ से मिट जाएगा। कतर समझौते के दौरान दोनों देशों ने एक दूसरे की सीमा और संप्रभुता का सम्मान करने की बात मानी है। लेकिन, पाकिस्तान ने जब कहा कि तालिबान के साथ डूरंड लाइन पर बात हुई है तो तालिबान ने उसे तुरंत झूठा करार दे दिया। कतर की तरफ से जारी नई प्रेस रिलीज में भी डूरंड लाइन की कोई चर्चा नहीं की गई थी।
यानि डूरंड लाइन पर कोई बात नहीं हुई है, इसीलिए सवाल ये हैं कि क्या ये युद्धविराम सिर्फ क्षण भर के लिए है? क्योंकि संघर्ष के असली कारण अब भी जस के तस बने हुए हैं। सीमाओं के पार अविश्वास, वैचारिक मतभेद और राजनीतिक हितों की उलझनें किसी भी वक्त इस नाजुक शांति को भंग कर सकती हैं।
Home / News / पाकिस्तान और अफगानिस्तान में नहीं टिक पाएगा शांति समझौता, जानिए जिन्ना के देश को क्यों डंसेगा तालिबान का ‘सांप’?
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