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चीन पारंपरिक युद्ध में भी परमाणु बम गिराएगा? गलवान तनाव के बीच किस तरह के बम का किया था टेस्‍ट, बड़ा खुलासा


चीन ने भारत के साथ गलवान संघर्ष के ठीक एक हफ्ते बाद परमाणु बम का परीक्षण किया था। अमेरिकी विदेश विभाग के सीनियर आर्म्स कंट्रोल अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि “चीन ने 2020 में एक गुप्त अंडरग्राउंड न्यूक्लियर ब्लास्ट किया था, जिसका पता कज़ाकिस्तान के एक सीस्मिक स्टेशन ने लगाया था।” उन्होंने आगे कहा कि “इस परमाणु परीक्षण का मकसद बीजिंग की न्यूक्लियर युद्ध क्षमता को बेहतर बनाना था।” अमेरिकी विदेश विभाग के आर्म्स कंट्रोल और नॉन-प्रोलिफरेशन के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर येव ने चीन के इस परमाणु परीक्षण को लेकर कई जानकारियां दी हैं।
क्रिस्टोफर येव ने कहा है कि परमाणु परीक्षण पर बैन लगाने के ट्रीटी पर चीन ने हस्ताक्षर कर रखे हैं और न्यूक्लियर टेस्ट कर चीन ने खुद से लगाई गई रोक का उल्लंघन किया है। येव ने कहा है कि टेस्ट का समय और जगह दक्षिणी कजाकिस्तान के मकानची में एक सीस्मिक मॉनिटरिंग स्टेशन से पुष्टि हुई थी। आपको बता दें कि माना जा रहा है कि इसी रिपोर्ट के आने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने भी ऐलान किया है कि अमेरिका भी अब फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करेगा, क्योंकि चीन रूस और पाकिस्तान जैसे देश न्यूक्लियर टेस्ट से परहेज नहीं कर रहे हैं।
चीन ने 2020 में किया था परमाणु परीक्षण – अमेरिकी अधिकारी क्रिस्टोफर येव ने कहा है कि चीन में हुए भूमिगत धमाके की तीव्रता सीस्मिक स्केल पर 2.75 मैग्नीट्यूड थी और इसका सिग्नेचर “भूकंप जैसा नहीं था।” इससे पहले अमेरिकी एयर फोर्स ग्लोबल स्ट्राइक कमांड के पूर्व चीफ साइंटिस्ट ने मंगलवार को हडसन इंस्टीट्यूट में कहा था “इस बात की बहुत कम संभावना है कि यह एक धमाके के अलावा कुछ और हो, एक अकेला धमाका।” इसके अलावा, चीन ने इंटरनेशनल मॉनिटर्स से टेस्ट को छिपाने के लिए डीकपलिंग नाम के एक टेस्टिंग मेथड का इस्तेमाल किया था।
आपको बता दें कि न्यूक्लियर टेस्ट डीकपलिंग, परमाणु परीक्षण के समय होने वाले धमाके को छिपाने की एक तकनीक है जिसमें जमीन के नीचे बड़ी गहरी खोह में न्यूक्लियर धमाका किया जाता है, ताकि धमाके के भूकंप के असर को कम किया जा सके। अमेरिकी अधिकारी ने इसके अलावा दावा किया है कि 2020 में परमाणु परीक्षण करने के 6 साल बाद चीन एक और न्यूक्लियर टेस्ट करने जा रहा है। जिसमें “सैकड़ों टन” तक की धमाके की शक्ति होगी। ये बहुत बड़ा दावा है।
वहीं वियना में मल्टीनेशनल कॉम्प्रिहेंसिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन के एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी रॉबर्ट फ़्लॉयड ने भी पुष्टि की है कि चीन के लोप नूर न्यूक्लियर टेस्ट साइट के पास “दो बहुत छोटे भूकंपीय घटनाओं” को दर्ज किया गया है, जिसकी प्रकृति वास्तविक भूकंप जैसी नहीं थी, जिससे ब्लास्ट का पता चला था। हालांकि, ये टेस्ट ऑर्गनाइजेशन को न्यूक्लियर ब्लास्ट का पता लगाने के लिए जरूरी 500 टन एक्सप्लोसिव पावर की लिमिट से कम लगते हैं।
चीन के परमाणु परीक्षण की सबसे खतरनाक बात क्या है? – रिपोर्ट के मुताबिक चीन अपनी ‘लोप नोर’ टेस्ट साइट पर गुप्त रूप से छोटे स्तर के परमाणु परीक्षण किए हैं। ताकि वह अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता और सटीकता बढ़ा सके। इससे संकेत मिलते हैं चीन अब सिर्फ ‘न्यूनतम प्रतिरोध’ की बात नहीं कर रहा, बल्कि वह ऐसे हथियार विकसित कर रहा है जिनका उपयोग असल युद्ध में किया जा सके। चीन ने ये टेस्ट गलवान घाटी संघर्ष के ठीक बात किए थे। जिससे साफ पता चलता है कि चीन की सैन्य तैयारियों में परमाणु बमों की अलग अलग क्षमता का विस्तार, भारत के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह भारत की ‘नो फर्स्ट यूज़’ नीति पर दबाव डाल सकता है।
इसके अलावा पता ये भी चलता है कि चीन इन परमाणु हथियारों को बडे़ पैमाने पर अपनी पनडुब्बियों, मिसाइलों और बॉम्बरों में इंटीग्रेट करने जा रहा है। वहीं जून 2020 में परमाणु परीक्षण के ठीक बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सरकारी ब्रॉडकास्टर चाइना सेंट्रल टेलीविजन (CCTV) ने PLA के एक इंजीनियरिंग प्रोफेसर का इंटरव्यू किया था। जिसमें जिन्होंने कहा कि चीन को अपने अंडरग्राउंड न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को हमले से बचाने के लिए एडवांस्ड डिफेंस बनाने की जरूरत है।