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लगातार हो रहा है सिरदर्द, नजर भी हो रही धुंधली? कहीं ICP तो नहीं बढ़ गया, खतरनाक है इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन


ब्रेन के नाजुक टिश्यू को ट्रॉमा या चोट से बचाने का काम खोपड़ी और मस्तिष्क के बीच मौजूद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड करता है। लेकिन जब ब्रेन टिश्यू, ब्लड या इस फ्लूइड का संतुलन बिगड़ जाता है तो खोपड़ी के अंदर का इंट्राक्रैनियल प्रेशर में बढ़ोतरी हो जाती है। इससे इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन होती है, जिसके सबसे आम लक्षण लगातार सिरदर्द और नजर धुंधली होना हैं।
इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन के लक्षण (सांकेतिक तस्वीर) – अगर किसी मरीज को अपने सिरदर्द, धुंधली नजर, उल्टी जैसी समस्याओं का कोई कारण समझ नहीं आ रहा है तो इनकी वजह इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन हो सकता है। मैंने डॉक्टरी के अपने करियर में ऐसे कई मामले देखे हैं, जिसमें इन दिक्कतों के पीछे इंट्राक्रैनियल प्रेशर (ICP) में बढ़ोतरी होती है। शुरुआती दौर में इस मेडिकल कंडीशन को शुरुआत में पकड़ना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस वक्त इलाज आसान होता है और इसके जानलेवा होने का खतरा भी कम होता है।
इंसान का दिमाग खोपड़ी के अंदर सुरक्षित रहता है। चूंकि खोपड़ी हड्डियों की सख्त संरचना है, इसलिए दिमाग और खोपड़ी के बीच में हर तरफ सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) मौजूद होता है। यह तरल मस्तिष्क के नाजुक उत्तकों को दलक या चोट पहुंचने से बचाता है। जब खोपड़ी के अंदर मौजूद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड, खून और ब्रेन टिश्यू का बैलेंस बिगड़ने लगता है तो इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन विकसित होता है। खोपड़ी के सख्त होने और इन चीजों में सूजन, ब्लीडिंग या अतिरिक्त वॉल्यूम होने से अंदर का इंट्राक्रैनियल प्रेशर बढ़ जाता है।
कितना होना चाहिए इंट्राक्रैनियल प्रेशर? -वयस्कों में इंट्राक्रैनियल प्रेशर का सामान्य लेवल 5 से लेकर 15 mmHg होता है। जब इंट्राक्रैनियल प्रेशर सामान्य लेवल से ज्यादा रहने लगता है तो नाजुक ब्रेन टिश्यू और ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ता है। इससे दिमाग के जरूरी हिस्सों को मिलने वाली ब्लड सप्लाई और ऑक्सीजन डिलीवरी बाधित हो जाती है। अगर इस प्रेशर को फिर से संतुलित ना किया जाए तो ब्रेन डैमेज हो सकता है।
इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन के कारण – इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन के पीछे कई सारी स्थितियां हो सकती हैं। इनमें ब्रेन ट्यूमर, ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी, मेनिन्जाइटिस जैसे ब्रेन इंफेक्शन, स्ट्रोक, हाइड्रोसेफलस और इंट्राक्रैनियल ब्लीडिंग प्रमुख हैं। कई मामलों में यह समस्या बिना किसी स्पष्ट कारण के भी हो सकती है, ऐसे स्थिति में इस समस्या को इडियोपैथिक इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन (IIH) कहा जाता है। यह महिलाओं और ज्यादा शारीरिक वजन वाले लोगों में आम है।
इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन के लक्षण और संकेत – यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है और प्रेशर बढ़ने के साथ लक्षण गंभीर होते जाते हैं।
लगातार सिरदर्द रहना सबसे आम लक्षण है, जो सुबह के वक्त और लेटने पर बढ़ जाता है। खांसने, छींकने या जोर लगाने पर यह दर्द और आक्रामक हो जाता है।
अगला आम लक्षण देखने में गड़बड़ी होना है। इसके मरीजों को नजर धुंधली होना, डबल विजन या थोड़ी देर के लिए आंखों की रोशनी चले जाने की दिक्कत हो सकती है। ऐसा ऑप्टिक नर्व पर इंट्राक्रैनियल प्रेशर बढ़ने की वजह से होता है। इससे ऑप्टिक डिस्क में सूजन या पैपिल्डेमा की कंडीशन होती है।
अगर आपको पेट की दिक्कत के बिना उल्टी या जी मिचलाने की समस्या हो रही है और वो भी खासतौर से सुबह के वक्त तो यह भी इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन हो सकता है। कई सारे मरीजों को आंखों के पीछे भी दबाव महसूस होने लगता है।
कुछ एडवांस मामलों में मरीजों को फोकस करने में दिक्कत, कंफ्यूजन, चिड़चिड़ापन और मानसिक स्थिति में बदलाव का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों को शरीर का बैलेंस बनाने में परेशानी, चक्कर आना या कान बजने की दिक्कत हो सकती है।
गंभीर होने पर इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन की वजह से हर वक्त नींद आना, दौरे पड़ना, अंगों में कमजोरी या बेहोशी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में मेडिकल हेल्प की तुरंत जरूरत होती है।
इस स्थिति के क्या-क्या जोखिम हो सकते हैं? – अगर इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन को वक्त पर पहचानकर सही ना किया जाए तो गंभीर और कभी ठीक ना होने वाली दिक्कतें हो सकती हैं।
ऑप्टिक नर्व पर लंबे समय तक प्रेशर पड़ने से आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चले जाना।
दिमाग पर लगातार दबाव पड़ने पर दिमाग के टिश्यू अपनी जगह से हटने के कारण ब्रेन हर्निएशन नाम की जानलेवा बीमारी होना।
लंबे समय तक ब्रेन टिश्यू को ऑक्सीजन और ब्लड फ्लो की कमी होने से परमानेंट न्यूरोलॉजिकल डैमेज, कॉग्निटिव फंक्शन में कमी और गंभीर मामलों में मृत्यु।
इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन का कैसे होता है इलाज? – जोखिमों को कम करने और इलाज के लिए बीमारी का जल्दी पता लगाना काफी महत्वपूर्ण है। इसके लिए डॉक्टर न्यूरोलॉजिकल एग्जामिनेशन और आंखों की जांच के द्वारा बीमारी के संकेतों को पकड़ता है। इसके साथ सीटी स्कैन, एमआरआई और कुछ मामलों में लुंबर पंक्चर जैसे टेस्ट की मदद ली जाती है।
निदान होने के बाद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड के उत्पादन या मस्तिष्क की सूजन कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं। इडियोपैथिक इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन की स्थिति में एसिटाजोलामाइड या ड्यूरेटिक्स जैसी दवा दी जाती हैं। गंभीर और आपातकालीन मामलों में डॉक्टर वेंट्रिकुलोपेरिटोनियल शंट प्लेसमेंट, ट्यूमर रिमूवल या डीकंप्रेसिव सर्जरी जैसे सर्जिकल इंटरवेंशन से प्रेशर कम करने में मदद मिलती है। कई बार इंट्राक्रैनियल प्रेशर बढ़ाने वाले ट्यूमर का उपचार करने के लिए प्रीसीजन रेडियोसर्जरी जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भी करना पड़ता है।
शुरुआत में पकड़े जाने पर इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन एक उपचारित स्थिति है। इसलिए लगातार सिरदर्द के साथ नजर में गड़बड़ी, उल्टी और न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को इग्नोर नहीं करना चाहिए। न्यूरोलॉजिस्ट या न्यूरोसर्जन की मदद लेकर इस बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।