
एक बार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सुबह के समय मंदिर से अपने घर वापस जा रहे थे। कुछ दूरी पर ही उन्हें बचाओ-बचाओ मेरी जान बचाओ की चीख सुनाई दी। एक अछूत स्त्री को सांप ने काट लिया था। कोई उस स्त्री की सहायता नहीं कर रहा था। आचार्य द्विवेदी जैसे ही वहां पहुंचे, लोग कहने लगे, आचार्य जी इसे हाथ मत लगाना। यह अछूत है।
द्विवेदी जी ने किसी की परवाह किए बिना स्त्री को अपनी गोद में बैठाया और कुछ और न पाकर अपना जनेऊ तोड़कर स्त्री के पैर में सांप द्वारा काटे गए स्थान से थोड़ा ऊपर कसकर बांध दिया। फिर चाकू से उस स्थान पर चीरा लगा, दूषित खून बाहर निकाल दिया। स्त्री की जान बच गई।
इतनी देर में वहां गांव के कुछ और लोग इकट्ठा हो गए। वे आपस में बातें करने लगे कि आज से धर्म की नाव तो समझो डूब गई। देखो तो इसको, ब्राह्मण होकर जनेऊ जैसी पवित्र वस्तु को इस स्त्री के पैर से छुआ दिया। अब कौन हम ब्राह्मणों का सम्मान करेगा।
उनकी ऐसी बातें सुन द्विवेदी जी जोर से बोले, इस जनेऊ के कारण ही एक स्त्री की जान बची है। मैं खुश हूं कि आज मेरा ब्राह्मण होना किसी के काम आ सका। आज से पहले इस जनेऊ की कीमत ही क्या थी। आज इसने इसकी जान बचाकर अपनी असल उपयोगिता साबित कर दी है। अब मैं शायद ही कभी इस जनेऊ को उतारने का ख्याल करूंगा।
द्विवेदी जी की बातों का किसी के पास कोई जवाब नहीं था। सभी ने द्विवेदी जी से माफी मांगी और भविष्य में मानव धर्म की रक्षा की कसम खाई।
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