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पंगा लेकर मुसीबत में फंस गए ट्रंप

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनान्ड ट्रंप पर यह कहावत सटीक बैठती है कि आ बैल मुझे मार। बैठे बिठाए उन्होंने न्याय व्यवस्था से पंगा ले लिया। एक जज की निष्पक्षता पर बेतुका सवाल उठा दिया। इसके लिए उनकी काफी आलोचना हुई। इस संंबंध में फॉक्स न्यूज डॉट कॉम के साभार से हाल में हुई इस घटना का विश्लेषण किया जा रहा है। ऐसा माना जाने लगा है कि जब अमरीका की न्याय व्यवस्था को समझना हो तो संभव है कि डोनाल्ड ट्रंप की अज्ञानता का जिक्र भी किया जाएगा।

यूनिवर्सिटी घोटाले से संबंधित दो मुकदमों की सुनवाई कर रहे फेडरल जज पर ट्रंप द्वारा किए गए हमले की घटना यह साबित करती है कि उन्हें न्यायिक व्यवस्था से उलढना नहीं चाहिए था। ट्रंप इस बात पर अड़ गए कि जज गोंजेलो क्यूरियल का जन्म इंडियाना में हुआ, वे इस मुकदमे की सुनवाई करने के लिए अयोग्य हैं क्योंकि उनके वंशज मैक्सिको के थे। वैसे भी अमरीका के यह संभावित उम्मीदवार देश की दक्षिणी सीमा पर दीवार खड़ी करने की घोषणा कर चुके हैं। दक्षिणी सीमा में मैक्सिको स्थित है।

ट्रंप की इस दलील के समर्थन में न कानूनी तौर और न ही तथ्यों के आधार पर खड़ा हुआ जा सकता है। एक जज की पहचान जातीय आधार पर नहीं, बल्कि कानून के द्वारा पहचानी जाती है। ऐसा कभी नहीं हुआ है। न ही जाति, लिंग या धर्म आदि उसकी व्यक्तिगत पहचान से संबंधित होते हैं। ट्रंप का यह तर्क दर्शाता है कि उन्हें न्याय व्यवस्था के प्रति उनकी बुनियादी जानकारी नहीं है। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि कारोबार के सिलसिले में ट्रंप का काफी समय अदालतों में बीता है और वे इस प्रकार की निराधार बात करते हैं।

इसका कोई प्रमाण नहीं है कि जज कूरियल ने अपनी जाति से प्रभावित होकर ट्रंप के अच्छा व्यवहार न किया हो। लेकिन ट्रंप दावा करते हैं कि कई सुनवाइयों के दौरान उनके खिलाफ फैसला सुनाया गया। इसलिए बेहतर होगा कि डोनाल्ड ट्रंप 1966 के अमरीकी सरकार और ग्रिनेली कॉरपोरेशन के बीच चले मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को जरूर पढ़ें। इस मुकदमे में हाई कोर्ट ने फैसला किया था कि किसी की ओर इशारा किए जाने से हार जाना पक्षपात होने का प्रमाण नहीं होता है।

यदि यूनिवर्सिटी घोटाले से संबंधित मामले में जज कूरियल द्वारा दिए गए फैसले की प्रति को पढ़ा जाए तो उसके पर्याप्त कारणों और उचित होने की स्पष्ट तस्वीर सामने आ जाएगी। इसमें ट्रंप ने उसके साथ सही व्यवहार न होने का जो दावा किया था उसका कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलता है। वह यह मुकदमा इसलिए हार गए क्योेंकि गलत थे। इसलिए न कानून और न ही तथ्यों ने उनका साथ दिया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ट्रंप ने निष्पक्षता और ईमानदारी को खो दिया।

ट्रंप के बचाव में सिर्फ पूर्व एटार्नी जनरल अल्बट्रो गुंजेल्स खड़े थे। उनका तर्क था कि गलत आभास या अनुमान होने के आधार पर ट्रंप स्वयं को मुकदमे से मुक्त करने के लिए कह सकते हैं। जब किसी मामले को इस नजरिये से न्यायसंगत ठहराने का प्रयास किया जाएगा तो यह स्वीकार्य नहीं होता है। अदालत में गवाहों और प्रमाणों की आवश्यकता होती है। खासतौर पर जब किसी जज के विरुद्ध कोई शिकायत हो।

ट्रंप के वकीलों के पास उसे मुक्त करने की अपील करने की पूरी छूट थी। लेकिन उनके मुवक्किल ने जिन अपशब्दों का इस्तेमाल किया था उस पर उनके वे भी कुछ नहीं कर पाए। इसका कारण साधारण था, वकीलों ने उस संघीय कानून को अध्ययन किया था जो ट्रंप को मुक्त करने के लिए अयोग्य ठहराता था। व्यक्तिगत तौर पर ट्रंप दबाव बना रहे थे जबकि कानून सिर्फ आरोप नहीं, इसे साबित करने या कारणों को पेश करने को कहता है।

जब अपनी दलील में ट्रंप फंस गए तो बजाय पीछे हटने के वह बेकाबू हो गए। पिछले सप्ताह भी वह ऐसे मामले में फंस गए जब उन्होंने कहा कि यदि मुस्लिम जज होते तो वे निष्पक्ष रहते। ट्रंप के इस तक का क्या यह अर्थ माना जाए कि ज्यूयिश जज ऐसे मामले को नहीं निपटा पाते जिसमें उनके सामने कोई ज्यूयिश खड़ा हो, जातीय आधार पर पक्षपात किए जाने के मामलों में अश्वेत जज ढंग से सुनवाई नहीं करते, गर्भपात या महिलाओं से संबंधित मामले में महिला जज नहीं आ सकती या गोरे जज स्वयं को ऐसे मामले से दूर रखें जिसमें कोई गोरा अथवा अश्वेत हो। इसका सार है कि ट्रंप किसी जज को बख्शना ही नहीं चाहेंगे।

चर्चा इस बात की है कि ट्रंप को कोर्ट में सावधान रहना चाहिए था। कुतर्कों और अपशब्दों वाली टिप्पणी करने से उन्होंने बेवजह मुसीबत मोल ले ली

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