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आर्मेनिया के लिए भारत दोस्त, पाक कट्टर दुश्मन


आर्मेनिया के लोग भारत को अपना दोस्त मानते हैं तथा उससे संबंधों को और मजबूत बनाना चाहते हैं लेकिन पाकिस्तान उसके लिए किसी कट्टर दुश्मन से कम नहीं है। इसकी वजह पाकिस्तान के अजरबेजान और तुर्की के साथ करीबी संबंध हैं। अजरबेजान और तुर्की ऐसे देश हैं जिनके साथ आर्मेनिया की सदियों से लड़ाई होती आई है। साथ ही पाकिस्तान ही एक ऐसा मुल्क है जिसने न तो देश के रूप में आर्मेनिया को मान्यता दी है और न ही वह उसके अस्तित्व को मानता है।

आर्मेनिया और पाकिस्तान के बीच किसी तरह का राजनीतिक व कूटनीतिक संबंध नहीं है। आर्मेनिया किसी पाकिस्तानी को वीजा भी नहीं देता। आर्मेनियाई लोगों से इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि भारत को चाहिए कि वह आर्मेनिया की हरसंभव मदद करे और यहां अधिक से अधिक निवेश करे क्योंकि यहां के लोग पाकिस्तान को अपना दुश्मन मानते हैं।

जब एक ईसाई मठ को मुस्लिम शासक ने बचाया
आर्मेनिया की राजधानी येरेवान के 100 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में पहाडिय़ों से घिरा हघर्टि्सन ईसाई मठ मध्ययुगीन वास्तुकला की शानदार झलक पेश करता है। 10वीं सदी में बना यह मठ वक्त के थपेड़ों और देखभाल के अभाव में नष्ट होने की कगार पर पहुंच गया था लेकिन एक मुस्लिम शासक ने धार्मिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हुए इसे बचा लिया।

इस मठ को बचाने का श्रेय शारजाह के प्रिंस डा. शेख सुल्तान बिन मोहम्मद अल कासिमी को जाता है। जब वह 2005 में आर्मेनिया के दौरे पर आए थे तो उन्होंने इस मठ के जीर्णोद्धार के लिए दिल खोल कर मदद की। स्थानीय मीडिया का कहना है कि शेख ने इस मठ को 10.7 लाख डालर दान किए। इन पैसों से मठ का जीर्णोद्धार किया गया और यहां तक पहुंचने के लिए एक सड़क भी बनाई गई। इस मठ में 3 चर्च बने हुए हैं। स्थानीय लोगों से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि आर्मेनिया के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जब किसी ईसाई मठ को एक मुस्लिम शासक ने बचाया हो। शायद यही वजह है कि आर्मेनिया के संयुक्त अरब अमीरात (यू.ए.ई.) के साथ बहुत मधुर संबंध हैं और यहां आने के लिए यू.ए.ई. के लोगों को वीजा भी नहीं लेना पड़ता।

पुरुष कम, महिलाओं की संख्या ज्यादा
आर्मेनिया के लोगों का रहन-सहन आधुनिक सुख-सुविधाओं से सम्पन्न है, यहां का खाना और आबो-हवा भी बहुत अच्छी है। हालांकि यह देश दशकों से एक समस्या से भी जूझ रहा है। यह समस्या लिंगानुपात से जुड़ी है। भारत में जहां कई राज्यों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या कम हो रही है लेकिन आर्मेनिया में इसका उलटा है। यहां मर्दों की संख्या कम और महिलाओं की तादाद ज्यादा है तथा महिलाएं ही ज्यादातर कामकाज संभालती हैं। सरकार देश में पुरुषों की संख्या को बढ़ाने के लगातार प्रयास कर रही है।

संयुक्त परिवार में विश्वास
भारत जैसे देश में भी आज के सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवार तेजी से टूटते जा रहे हैं और उसकी जगह एकल परिवार ले रहे हैं लेकिन आर्मेनिया एक ऐसा देश है जहां अभी भी ज्यादातर लोगों का संयुक्त परिवार की प्रथा में विश्वास है। यहां के लोग एकाकी जीवन जीने की बजाय संयुक्त परिवार में भरोसा रखते हैं।आर्मेनिया एक क्रिश्चियन देश है। यहां के लोग मूलत: ईसाई हैं और धर्म को मानने वाले हैं। लोगों में धार्मिक कट्टरता इस कदर है कि यदि वे सुबह चर्च के लिए निकलते हैं तो उनका सिर झुका हुआ होता है और वे प्रार्थना में तल्लीन रहते हैं। चर्च जाते समय लोग मुंह इधर-उधर नहीं घुमाते और न ही आसपास की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उनका ध्यान सिर्फ आत्मङ्क्षचतन और प्रार्थना पर ही रहता है।

फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं, लोग पापड़ के शौकीन
आर्मेनिया में भारत की तरह कृषि व्यवसाय भी व्यापक है। यहां के लोग खेतीबाड़ी में फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं करते और जैविक उत्पादों को ही बढ़ावा देते हैं। भारत की तरह आर्मेनिया में भी लोग मुरब्बे और अचार के बेहद शौकीन हैं। जिस तरह भारत में आम का अचार, जूस और पापड़ आदि बनाए जाते हैं उसी तरह यहां भी आम, आलू व अन्य सब्जियों-फलों को सुखा कर उनके पापड़, अचार आदि बनाए जाते हैं।

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