
अभी दुनिया भर में जितने भी संघर्ष हो रहे हैं, उसने एक बात तो साफ कर दिया है कि अब परंपरागत युद्ध के दिन बीत चुके हैं। आज बात सिर्फ मॉडर्न वॉरफेयर, नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर की हो रही है। भारत तो खुद ही ऑपरेशन सिंदूर में इसे आजामा चुका है, जिसके आगे पाकिस्तान के अमेरिकी और चीनी हथियार घुटने टेक चुके हैं। लेकिन, भारतीय सेना इतने भर से संतुष्ट नहीं है। हम पूरे साल दो मोर्चों पर अपने चीन-पाकिस्तान जैसे दुश्मन पड़ोसियों के खतरे का सामना करते हैं। इसी को देखते हुए, भारत रॉकेट-मिसाइल फोर्स गठित करने की सोच रहा है। क्योंकि, इस मामले में चीन हमसे बहुत आगे है तो पाकिस्तान ने भी ऐसी मिलिट्री यूनिट बना ली है।
रॉकेट-मिसाइल फोर्स समय की जरूरत – भारत 15 जनवरी, 2026 को हर साल की तरह सेना दिवस ( Army Day ) मना रहा है। इसी मौके पर हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवदी ने भी इस बात पर जोर दिया कि सुरक्षा आवश्यकताएं ऐसी स्पेशलाइज्ड मिलिट्री यूनिट की ओर देखने को कह रही हैं, जिसमें एक कमांड के भीतर लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल तैनात हों। उन्होंने कहा, ‘हम एक रॉकेट-मिसाइल फोर्स की ओर देख रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान ने एक रॉकेट फोर्स गठित कर लिया है और चीन ने भी ऐसी फोर्स बना ली है। यह समय की जरूरत है।’
अभी अलग-अलग यूनिट संभालते हैं – अभी भारत के मिसाइल और रॉकेट भंडार को आर्मी एयर डिफेंस कोर (AAD) और आर्टिलरी रेजिमेंट संभालते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत ने अपनी लंबी-दूरी की मारक क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिशों पर पूरा जोर दे रखा है। आर्मी चीफ का कहना है कि नए जमाने के जंग में रॉकेट और मिसाइल एक-दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। उनका कहना है, ‘आज आप देखेंगे कि रॉकेट और मिसाइलें आपस में एक-दूसरे से जुड़ गए हैं, अगर हम कोई असर डालना चाहते हैं, तो रॉकेट और मिसाइल दोनों ही ऐसा कर सकते हैं।’ वैसे दोनों अलग-अलग हैं और रॉकेट के उलट मिसाइल तय टारगेट को हिट करने के लिए बनाई गई है, जिसमें इंटर्नल गाइडेंस सिस्टम भी होते हैं।
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