
पहलगाम हमले के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने भारतीय रक्षा उत्पादन की ताकत दिखाई। इसके बाद से रक्षा क्षेत्र में तेजी आई है, कंपनियों को ज्यादा ऑर्डर मिल रहे हैं और निवेश बढ़ रहा है। भारत अब हथियारों के आयात पर निर्भरता कम करके घरेलू उत्पादन पर ध्यान दे रहा है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में दुनिया ने भारतीय सेना की ताकत को देखा। इसने भारत की रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की क्षमता को भी उजागर किया। इस ऑपरेशन के बाद से भारत में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में काफी तेजी आई है। भारतीय कंपनियों को ज्यादा ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। कुछ ने तो नए निवेश (पूंजीगत व्यय) की योजनाएं भी बनाई हैं। हाल ही में उद्योग चैंबर CII के एक बड़े प्रोग्राम में भारत फोर्ज के प्रमुख बाबा कल्याणी ने भी इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी सेना के लिए तेजी से उपकरण बनाने होंगे ताकि वे आज और भविष्य की जरूरतों को पूरा कर सकें। पुणे की भारत फोर्ज देश की प्रमुख निजी रक्षा कंपनियों में से एक है। भारतीय रक्षा फर्में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन रही हैं। उनकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत हो रही है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह भी दिखाया कि भारतीय सशस्त्र बल अब स्वदेशी उत्पादों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। इससे भारत का हथियार आयात कम होगा। यह ‘ मेक इन इंडिया ‘ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों की सफलता का प्रमाण है।
हथियारों के सबसे बड़े सौदागरों या निर्यातक देशों में रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों का नाम है। भारत भी इनसे बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद-फरोख्त करता है। लेकिन, पिछले कुछ सालों में उसकी एप्रोच में एक बड़ा बदलाव आया है। उसने हथियारों की घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग पर फोकस बढ़ाया है। भारत सैन्य खर्च के मामले में दुनिया का प्रमुख देश है। 2024 में भारत ने सैन्य उपकरणों पर 86.1 अरब डॉलर खर्च किए, जो उसे पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बनाता है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के हिस्से के रूप में यह खर्च 2.3% है।
आयात में आई है गिरावट – ऑपरेशन सिंदूर’ ने दिखाया कि भारतीय सशस्त्र बलों का स्वदेशी उत्पादों पर भरोसा बढ़ा है। इसका असर भारत के हथियार आयात पर पड़ेगा। 2020-24 की अवधि में भारत हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक था। हालांकि, इस अवधि में भारत का आयात 2015-19 की तुलना में 9.3% कम हुआ है। यह स्वदेशीकरण के प्रयासों की सफलता को दर्शाता है। यूक्रेन युद्ध के कारण यूक्रेन इस अवधि में सबसे बड़ा आयातक बन गया है।
SIPRI (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट) के अनुसार, 2015-19 और 2020-24 के बीच भारत के हथियार आयात में 9.3% की गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण भारत की अपनी हथियार बनाने की बढ़ती क्षमता है। 2010-14 की तुलना में रूस पर भारत की हथियारों की निर्भरता आधी होकर 36% रह गई है। भारत ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ फ्रांस, इजरायल और अमेरिका से खरीद बढ़ाई है। पड़ोसी देशों से बढ़ते तनाव, अस्थिर वैश्विक स्थिति और युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए भारत का कुल रक्षा खर्च बढ़ सकता है।
इसी दौरान, डसॉल्ट एविएशन (जो राफेल जेट बनाती है) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स ने हैदराबाद में राफेल लड़ाकू जेट के फ्यूजलेज (विमान का मुख्य ढांचा) बनाने के लिए समझौते किए। यह साझेदारी भारत के लिए बड़ा रक्षा निर्माण केंद्र बनने के लक्ष्य में मील का पत्थर है। हैदराबाद में टाटा की ओर से बनाई जाने वाली फैक्ट्री फ्रांस के बाहर पहली ऐसी जगह होगी जहां राफेल फ्यूजलेज बनेंगे। यह साझेदारी देश के रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग को बढ़ावा देगी और अन्य बड़ी विदेशी कंपनियों को भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित करेगी।
प्रमुख रक्षा निर्माता बनने की राह पर भारत – ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ और आसान नियमों जैसी सरकारी पहलों ने भारत को एक प्रमुख रक्षा निर्माता बनने की राह पर ला दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, स्वदेशी रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपये से 174% बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 1.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। इससे रक्षा खरीद में आयात की हिस्सेदारी लगभग 35% तक कम हो गई है।
सरकार ने निजी क्षेत्र को न केवल ज्यादा ऑर्डर देकर बल्कि समान अवसर प्रदान करके भी इस विकास को बढ़ावा दिया है। वहीं, रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2013-14 में 686 करोड़ रुपये से लगभग 34 गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 23,662 करोड़ रुपये हो गया है। यह दिखाता है कि भारत अब रक्षा निर्यात में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन रहा है।
निर्यात पर बढ़ा है फोकस – सरकार को उम्मीद है कि 2029 तक निर्यात 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। भारत लगभग 100 देशों को बुलेटप्रूफ जैकेट, डोर्नियर विमान, चेतक हेलीकॉप्टर, फास्ट इंटरसेप्टर बोट और हल्के टारपीडो जैसे उत्पाद निर्यात कर रहा है। लगभग 65% निर्यात निजी क्षेत्र ने किया है और यह चलन जारी रहने की उम्मीद है।
एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग की एक रिपोर्ट बताती है कि बोइंग ने भारत से अपने रक्षा आयात को पिछले चार सालों में 25 करोड़ डॉलर से चार गुना बढ़ाकर 1 अरब डॉलर कर दिया है। यह जल्द ही 2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। भारतीय रक्षा फर्में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन रही हैं। उनकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत हो रही है। यह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहलों की सफलता का प्रमाण है। दुनिया की टॉप 15 डिफेंस कंपनियों में दो भारतीय भी हैं। इनमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (HAL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) शामिल हैं।
भारत का लक्ष्य प्रमुख रक्षा निर्माता और निर्यातक बनना है। इसके लिए उसे R&D में भारी निवेश करना होगा, कंपोनेंट की खरीद में तेजी लानी होगी और बदलती युद्ध तकनीकों के साथ तालमेल बैठाना होगा।
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