
महज एक साल पहले तक जियो-पॉलिटिक्स में इंडो-पैसिफिक सबसे ज्यादा हावी था। लेकिन आज की तारीख में मिडिल ईस्ट हॉटस्पॉट बना हुआ है। ये सिर्फ संघर्षों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रयोगशाला बन चुका है। गाजा में युद्ध भले खत्म हो चुका है, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ है, यमन संकट जारी है, ईरान और इजरायल में कभी भी युद्ध छिड़ने का खतरा बना हुआ है और इन सबके बीच सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच भड़के तनाव ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। इस बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल के अंत (स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA)) में NATO जैसा सैन्य समझौता होता है, जिसमें एक पर हमला, दूसरे पर भी हमला माना जाएगा। वहीं अब तुर्की इसमें शामिल होने के काफी करीब पहुंच चुका है।
सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की के बीच अगर समझौता होता है तो ये सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं होगा, बल्कि इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, सामरिक गारंटी और परमाणु सुरक्षा तक फैला एक खतरनाक ढांचा बन जाएगा, जिससे भारत के लिए एक नया फ्रंट खुलने की आशंका बन जाएगी। पिछले साल संघर्ष के दौरान हम देख चुके हैं कि पाकिस्तान के साथ तुर्की खड़ा था। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसके जवाब में भारत, इजरायल और यूएई को मिलकर एक नया सैन्य गठबंधन बनाना चाहिए? क्या ये तीनों देश मिलकर एक नया शक्ति संतुलन स्थापित कर सकते हैं? ऊपर से देखने पर ये आसान लग सकता है, लेकिन ये इतना आसान नहीं है। ये एक काफी जटिल जाल है, जिसमें एक के बाद एक कई परत हैं और हर परत के अंदर उलझनें हैं।
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