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बच्‍चे को मेंटली और इमोशनली रखना है हेल्‍दी, तो गलती से भी ना कहें उससे ऐसी बातें

जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं माता-पिता की जिम्मेदारियां भी बढ़ती जाती हैं। यदि आपके घर भी बढ़ती उम्र के बच्चे हैं तो आप यह समझ सकते हैं कि उन बच्चों के साथ बातचीत करना या किसी फैसले पर पहुंचना कितना मुश्किल भरा होता है। बढ़ती उम्र के बच्चे समझदार होते हैं। अपने फैसले खुद लेने लगते हैं और अपने फैसलों पर ज्यादा दखलअंदाजी भी पसंद नहीं करते। ऐसे में सही समय पर सही सलाह देना माता-पिता का कर्तव्य बनता है, ताकि बच्चे किसी गलत निर्णय को अपने जीवन में शामिल ना करें। लेकिन टीनएज उम्र के बच्चों को समझाना या सलाह देना थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है। कई बार माता-पिता के द्वारा की गई बातचीत की शुरुआत बहस में या आरगुमेंट्स में भी बदल जाती है जिससे बच्चा माता-पिता से दूरी बनाने लगता है। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता समझें कि बढ़ते बच्चों के साथ हमें अपने व्यवहारर में कौन से बदलाव लाने चाहिए, जिससे बच्चा हम से दूरी ना बनाए और अपने दिल की बात पैरेंट्स से शेयर करें।
बहुत से माता-पिता बच्चों से बात करने की बजाय बच्चों को डांटना या उन पर हावी होकर बच्चों से बात करते हैं। ऐसा करना बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए समय रहते माता-पिता को अपने व्यवहार में बदलाव ले आना चाहिए। कुछ ऐसे बदलाव हैं जो माता-पिता अपने अंदर लाकर बच्चों के साथ अपने रिश्ते सुधार सकते हैं।
पहले उन्‍हें समझें माता-पिता होने के नाते आपका सबसे पहला कर्तव्य बनता है अपने बच्चे को समझना। बच्चे को पूरी तरह समझ कर उनके साथ किया गया व्यवहार बच्चे के साथ लाइफटाइम रहता है। आप बच्चे के साथ जो व्यवहार करते हैं बच्चा वही सीखता है और अपने व्यवहार में शामिल करता है।
​इमोशनली कनेक्‍ट करें – कई बार बच्चा दिल में चल रही बातें बयां नहीं कर पाता। ऐसे में आपका कर्तव्य है कि आप बच्चे की बॉडी लैंग्वेज, उसके हाव-भाव को समझें और समझने की कोशिश करें कि बच्चा आपसे क्या करना चाहता है। बच्चे के बिना कुछ बोले उसे समझ पाने से आप बच्चे को भावनात्मक रूप से समझ पाएंगे और बच्चा भी आपसे जुड़ा हुआ महसूस करेगा।
​हिम्‍मत ना हारें – भले ही बच्चा दुर्व्यवहार करता है और आपके साथ लगातार बच्चे की बहस होती है। लेकिन फिर भी सुधार की उम्मीद ना खोएं। पैरेंट्स होने के नाते आप हमेशा उम्मीद रखें कि बात से और समझदारी से बच्चे के व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता है। आपका व्यवहार ही बच्चे के बहस करने की आदत में बदलाव ला सकता है।
​मुद्दे को बढ़ाएं नहीं – कई बार माता-पिता के लिए टीनएजर बच्चों को संभालना मुश्किल हो जाता है। उन्हें नहीं समझ में आता कि बच्चों के साथ हो रहे तर्को को कब लगाम लगाना चाहिए। कई बार माता-पिता भी बच्चों के साथ हो रहे बहस में पूरी तरह भागीदार बनते हैं। जिससे बच्चे और माता-पिता के बीच खटास बढ़ती जाती है। पैरेंट्स को समझना चाहिए कि कब चुप्पी की जरुरत है।
पहले खुद से उम्‍मीद करें – यदि आप यह उम्मीद करते हैं कि बच्चा अपने आप ही अच्छा व्यवहार करने लगे और आप से किसी भी तरह का बहस ना करें, तो ऐसा सोचना गलत होगा। क्योंकि बच्चे वही करते हैं जो माता पिता को करते देखते हैं। इसलिए शुरुआत आपको करनी होगी। आपको बच्चे के साथ बात करने के लिए सही तरीका अपनाना होगा जो किसी भी तरह की बहस में तब्दील ना हो। सही तरीके से किए गए वार्तालाप से ही बच्चा अपने व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश करेगा।

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