
हर कपल चाहता है कि उनकी प्रेग्नेंसी जर्नी सुकून और शांति से भरपूर हो, ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे को एक पॉजिटिव और हेल्दी वातावरण मिल सके। ऐसे में गर्भ संस्कार एक बेहद अहम भूमिका निभाता है। यह एक तरीका है जिसके जरिए गर्भ में पल रहे बच्चे को सुरक्षित और सकारात्मक माहौल दिया जा सकता है। साथ ही, यह होने वाली मां को भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से संतुलित बनाए रखने में भी मदद करता है।
कपल्स इस बात का ध्यान भी रखें कि अब गर्भ संस्कार केवल कोई प्रथा या परंपरा नहीं बल्कि डॉक्टर्स भी इसके फायदे को मानते हैं। इसी क्रम में, आज के लेख में हम डॉ. नूतन पाखरे, जो एवाईजी एकेडमी की फाउंडर, योग एक्सपर्ट और गर्भ संस्कार कोच से विस्तार से समझते हैं कि आखिर गर्भ संस्कार क्या है और यह अजन्मे बच्चे को कैसे फायदा पहुंचाता है।
गर्भ संस्कर का क्या होता है अर्थ ? – डॉ. नूतन बताती हैं कि गर्भ संस्कार का मतलब है गर्भ में पल रहे बच्चे की देखभाल और उसे अच्छे संस्कार देना। इसमें संस्कार का मतलब है बच्चे को अच्छे विचार और आदतें देना। इसका मुख्य उद्देश्य प्रेग्नेंसी के दौरान मां के लिए एक शांत, सुरक्षित और सकारात्मक माहौल बनाना है, ताकि बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास सही और अच्छा हो।
वे आगे यह भी कहती हैं कि ध्यान रहे कि यह संस्कार कोई रीति-रिवाजाें या परंपरा के बारे में नहीं है, बल्कि डेलीरूटीन की आदतों के बारे में है जिसको प्रेग्नेंसी के दौरान अपनाने से गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग और भावनात्मक विकास को हेल्दी बनाने में मदद करती हैं।
गर्भ संस्कार कोच बताती हैं कि एक हेल्दी प्रेग्नेंसी के लिए गर्भवती महिला का सही पोषण लेना बेहद जरूरी होता है। दरअसल, भ्रूण का दिमाग खासकर 12वें से 28वें हफ्ते के बीच बहुत तेजी से विकसित होता है। ऐसे में इंडियन डाइट में भी सलाह भी दी जाती है कि ज्यादा खाने के बजाय बैलेंस और न्यूट्रीशियनयुक्त खाने पर जाेर होना चाहिए। यह पोषणयुक्त खाना गर्भवती महिलाएं नीचे दिए फूड्स की लिस्ट से प्राप्त कर सकते हैं।
आयरन: पालक, गुड़, खजूर, दालें
कैल्शियम: रागी, तिल, दही
ओमेगा-3 फैट्स: अखरोट, अलसी के बीज
प्रोटीन: दाल, पनीर, दही, भीगे हुए मेवे
फोलेट: हरी पत्तेदार सब्जियां, खट्टे फल
नोट- बिना मेडिकल अप्रूवल के हर्बल सप्लीमेंट्स, डिटॉक्स ड्रिंक्स या फास्टिंग से बचें। साथ ही, प्रेग्नेंसी में चक्कर, लगातार मतली, तेज वजन कम होना, या सूजन जैसी प्रॉब्लम हो रही हैं, तो फिर फौरन डाॅक्टर से संपर्क करना चाहिए।
एक्सपर्ट यह भी बताती हैं कि प्रेगनेंसी के 18-20 हफ्तों के आसपास शिशु की सुनने की क्षमता विकसित हो जाती है। इस समय हल्की और बार-बार आने वाली आवाजें शिशु को आराम देती हैं। हालांकि, इस दौरान गर्भवती महिलाओं को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।
– साफ्ट इंडियन क्लासिकल म्यूजिक सुनें
-बात करना या जोर से पढ़ना
-65 डेसिबल से ज्यादा तेज आवाज न सुनें
-हेडफोन को सीधे पेट पर न रखें
गर्भ संस्कार में नींद और आराम कितना जरूरी माना गया है? – योग एक्सपर्ट कहती हैं कि गर्भ संस्कार में नींद और आराम को दी गई है विशेष अहमियत दी जाती है। वहीं, बेहतर स्लीप नींद हार्मोनल संतुलन और इमोशनल रेगुलेशन में मदद करती है। स्टडीज बताती हैं कि अगर रोजाना 6 घंटे से कम सोते हैं, तो प्रेग्नेंसी में जटिलताओं (complications) का खतरा बढ़ सकता है।
– हर रात 7-9 घंटे सोने का लक्ष्य रखें
– 20 हफ़्ते के बाद बाईं करवट सोएं
-अगर थकान हो तो दोपहर में थोड़ी देर आराम करें
नोट- अगर आपको लगातार नींद न आने की समस्या है, सांस रुकने के साथ खर्राटे आते हैं, या फिर स्ट्रेस की वजह से नींद नहीं आती है, तो ऐसी कंडीशन में डॉक्टर से फौरन सलाह लें।
कोई धार्मिक रीति-रिवाज नहीं है गर्भ संस्कार – योग एक्सपर्ट और गर्भ संस्कार कोच डॉ. नूतन पाखरे कहती हैं कि गर्भ संस्कार कोई धार्मिक रीति-रिवाज नहीं है। यह प्रेग्नेंसी के दौरान देखभाल का एक तरीका है, जो साइंस और बारीकी से ऑब्जर्वेशन पर आधारित है। डॉ. पाखरे बताती हैं कि इसका मकसद अल्ट्रासाउंड या डॉक्टर की सलाह जैसी मेडिकल प्रोसीजर्स को बदलना नहीं, बल्कि उन्हें गर्भ संस्कार के साथ मिलाकर अपनाना है। वे हमेशा मेडिकल सलाह और गर्भ संस्कार रूटीन को साथ-साथ अपनाने की अहमियत पर जोर देती हैं।
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