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हँसाता हूँ, रूमानी बनाता हूँ, अलख जगाता हूँ , ह्रदय तक जाता हूँ : डॉ कुमार विश्वास

 

alok photoBy- Alok

 

Indianz X_PRESS ने डॉ कुमार विश्वास से न्यूज़ीलैण्ड आने से पहले बात की , वोह हाल ही में  अमेरिका प्रवास पर थे और एक के बाद अमरीका और कनाडा के  ७ शहरों में ९ दिन के अन्दर लोगो को अपने तेजस्वी व्यक्तित्व और शब्दों के सम्मोहन से आंदोलित कर रहे थे |

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गूगल ने उन्हें आमंत्रित किआ, नेट फ्लिक्स और आई फ़ोन ने उनसे हिंदी को लेकर चर्चा कि, फेसबुक ने हिंदी की बढती लोकप्रियता कि बहती गंगा में हाथ धोने के लिए उनसे महत्वपूर्ण सुझाव  लिए, केलिफोर्निया कि सरकार ने  हिंदी में उनके द्वार किए योगदान को सराहा  और प्रशस्ति पत्र प्रदान किआ | सारी दुनिया में अपनी कवितायों के माध्यम से परचम लहराने के बाद अब डॉ विश्वास आपहे मुखातिब होने अब  न्यूज़ीलैण्ड भी आ रहे है ……..तो आइये जानते है उनके अंतर्मन की कुछ बेबाक बाते ……

प्रश्न: आप देश के एकमात्र सेलब्रिटी कवी है और यह खुद कहते भी है ऐसा क्यों ?

उत्तर: क्यों नहीं , मैं एक कवी हूँ , मंच का कलाकार हूँ, लोगों को  हँसाता हूँ,  रूमानी बनाता  हूँ, अलख जगाता हूँ ,ह्रदय तक जाता हूँ | जब किसी भी क्षेत्र के कलाकार को वह स्टेटस पाने का हक है तो इस आधुनिक युग में एक कवी को क्यों नहीं | मैं इस बात को लेकर गौरवान्वित हूँ कि मैंने न सिर्फ अपना, वरन समूची कवी विरादरी को इस नए युग में पुन: आम से जोड़ा है युवा से जोड़ा है और हिंदी भाषा के माध्यम इस विधा को फिर उसकी वांछित ऊंचाई तक पहुँचाया है |

प्रश्न: आप अपनी सफलता से कितना संतुष्ट है ?

उत्तर: मेरे लिए सफलता के दो पहलु हैं | एक कवी व कलाकार का  और एक सांसारिक मनुष्य का | सांसारिक मनुष्य के नाते तो मैं बहुत संतुष्ट हूँ | वह सब है, जो होना चाहिए दुनियदारी के लिए हैं  | लेकिन अन्दर जो एक सृजक है वो निरंतर असंतुष्ट है | और सृज़न के लिए यह बहुत आवश्यक भी है |

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प्रश्न: आपकी अमरीकी यात्रा के दौरान आपको गूगल मुख्यालय आमंत्रित किआ गया, आपका केलिफोर्निया सरकार ने सम्मान किआ , कुछ उन अनुभवों के बारे में बताये ?

उत्तर: अच्छा लगता है, गूगल से निमंत्रण एक बहुत ही आत्मा विश्वास को बढाने वाला निमंत्रण था | मुझे इसने यह एह्साह कराया कि मैंने हिंदी कविता को इन्टरनेट से जोड़कर इसका कितना विस्तार किया जिसका कि प्रारंभिक दिनों में भयंकर विरोध हुआ  | मेरे पास ऐसे हजारों ईमेल हैं जो दुनिया के कोने कोने से जैसे ब्राज़ील से , उत्तर कोरिया से , जापान से आयें है, जो लोग हिंदी नहीं समझ रहे उन्हें भी इसमें रस है, उन्हें सुर और लय लुभा रहे हैं और हिंदी को जानने और समझने कि चेष्टा उत्पन्न कर रहे हैं | गूगल ने मुझसे यह भी कहा ही मेरी कविता हिंदी में सबसे ज्यादा सर्च कि जाने वाली रचनाये है | जिसका कि वह लाभ लेना चाहते हैं | चीजें बहुत तेजी से आगें बढ़ रही है , मेरी यहाँ ‘नेट फ्लिक्स’  वालों से बात हुई है | आई फ़ोन वाले भी हिंदी में एप को लेकर चर्चारत हैं | देखते जाइए बहुत तेजी से बदलाव आयेंगे |

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प्रश्न: आपका फिल्मो से फ़िल्मी गीत-संगीत से क्यों दूर हैं ?

उत्तर: मुझे लगता है , मुझे सही समय और  प्रोजेक्टस का इंतज़ार था | अभी हाल ही में आशा जी ने मेरा लिखा गाना एक आने वाली फिल्म भैरवी के लिए गाया | मैंने दो फिल्मो कि पटकथा पूरी कि है  जिसमे कि एक पर जल्दी ही शूट प्रारंभ करने कि योज़ना है |

प्रश्न: आशा भोंसले जी ने हाल ही में क्षुब्ध होकर कहा कि हिंदी फिल्म संगीत, गाना न होकर गाली हो गया है , आपका क्या कहना है , साथ ही उनके द्वारा रिकॉर्ड किये गाने का आपका अनुभव कैसा रहा ?

उत्तर: आशा जी कि रिकार्डिंग सपने के साकार होने जैसे थी, प्रयास है कि लता जी भी मेरे लिखे गाने तो अपनी सुमधुर आज दें | रही हिंदी फ़िल्मी संगीत कि बात तो सभ्रांत समाज संगीत कला के इस ह्रास से बहुत असहज है | आप ही कल्पना करें कि कोई बच्चा सनी लीओन को परदे पर देखकर अपने पापा से यह पूछे कि यह कौन है, तो क्या आप उनका कोई पुराना विडियो दिखाकर कुछ बता पाएंगे | स्थिति दुखद है लेकिन आप अपनी समर्थ से जितना कर सकते हैं उनता किया जा रहा है | चीजें बदलेंगी जरूर …..एक इमानदार प्रयास जारी है और रहेगा |

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प्रश्न: जीवन की इस गहन आपाधापी मैं काव्य की रचना कितनी दुष्कर है ?

उत्तर: दरअसल कविता की जो संभावनाएं है, या किसी भी सृज़नधर्मिता की जो संभावनाएं है उनमें चुनौतियां बहुत आवश्यक हैं | चाहे वो सामाजिक जीवन से मिले या आध्यात्मिक  जीवन से मिले या आत्मिक रूप से मिले | दुनिया की जो सर्वश्रेष्ठ कला है वो adversity या विसंगतियों से ही निकली है , चुनौतियों से ही निकली है | मेरे लिए यह कोई नया पल नहीं है , पहले ऐसी  चुनौतियाँ emotional आयी हैं , बहित समाय तक अपने संस्थान में रही हैं , फिर आन्दोलन में रही हैं | इसलिए इन चुनौतियों ने सृज़न में सहयोग ही किआ है |

 प्रश्न: आज हिंदी का स्टार राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आप कैसा मानते हैं , इसकी प्रगति या दुर्गति का मूल्यांकन  करें ?
उत्तर: मेरा मनन है की हिंदी का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर जिन मानकों पर होना था उन मानकों पर हुआ नहीं | उसका कारन यह रहा की जिन लोगों को कला संस्कृति और भाषा की चेतना का नियामन करना था वोह कहीं न कहीं  पस्शिम से बहुत प्रभावित थे | वोह इंग्लैंड से , अमेरिका से बहुत प्रभावित थे | वोह जो एक हजार वर्ष की गुलामी थी वोह इनकी आत्मा से नहीं निकली | जिसके लिए ज्यादा हमारे मंत्री ज़िम्मेदार रहे क्योंकि यह सरो चीजे राजनीती ही तै कर रही थी | जब तक हमने  यह समझा की जब तक हिंदी इस योग्य नहीं  हो जाती को वोह अंग्रेजी को स्थानापन्न  करे तब तक  सारा सरकारी काम अंग्रेजी में चलेगा , यही हमारी मानसिक बेचारगी और आत्मा की दुर्बलता को बताता था | एक निर्बल से भाषा जो २६ वर्णों में बंटी हुई है वोह इतनी महान कैसे हो गई की उसे हिंदी स्थानापन्न नहीं कर पाई | हमारी जो राज्नैतिल नियंत्रक शंक्तियाँ थी वोह इतनी शक्तिशाली नहीं थी की वो भाषा संस्कृती और कला का ठीक से परिरक्षण कर पाती | जिसका नुकसान  १९४७ के बाद पूरे  देश को हुआ |

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प्रश्न:  कविता पाठ का एक performing art होना एक कवी के ह्रदय के लिए सुखद है या समझौता है ?

उत्तर: बहुत सुखद है , बहुत आवश्यक है | देखिये संकृति, कला और भाषा यह स्वीमिंग पूल नहीं हैं | इसमे अलग अलग तरह के घाट मिलेंगे , अलग अलग तरह के जंगल मिलेंगे | अंग्रेजी की तो भाषा या अमेरिका का जो cultural plateform हा वोह २०० साल का है | हिंदी भाषा का इतिहास ही ११०० साल का है | हमारे पास हिंदी के अमीर खुसरो और सेहरापा जैसे मानक कवी हैं | तो यह तो बहुत ही अच्छी बात है है अगर काव्य पाठ performing art में तब्दील हो रही है और कॉन्सर्ट हो रहे है तो यह तो बहुत ही बढ़िया है  |

 प्रश्न: आपने सारी  दुनिया में गाया है अब तक का सबसे यादार अनुभव क्या रहा है ?

उत्तर: अभी तक का सबसे अद्भुत अनुभव जिसने मुझे प्रभावित का वो गूगल मुख्यालय में जब मैंने पहली बार मैंने परफॉर्म किआ तो मुझे बहुत अच्छा लगा की पूरी दुनिया में इस समय ज्ञान का कोष माने जाने वाली संस्थान ने अगर हिंदी के एक कवी को आमंत्रित कर रहा है और इतना मान दे रहा है और हिंदी को लेकर उससे बात कर रहा है तो उस अनुभव ने मुझे तृप्त की, मुझे संतुष्टि दी की हिंदी यहाँ तक पहुँच गयी है |

प्रश्न: आप की कविता कोई दीवाना कहता है ने सारी  दुनिया में तहलका मचाया और लोगों के दिलों को छुआ , ऐसा कैसे संभव हुआ ?

उत्तर: यह ऐसे संभव हुआ की जब २००२ के आसपास संचार के नए माध्यम आ रहे थे और ऑरकुट (orkut) उस ज़माने में चलता था , youtube नया नया आया था , उस समय मैं यह पहचान गया था मुझे यह आहट महसूस हो गयी थी की अगर भाषा को आगे ले जाना है , तो भारत जो की युवकों का देश है इन माध्यमो से आपको उस तक पहुँचाना पड़ेगा | और वह  पीढ़ी हिंदी की performing art से पूरी तरह कटी हुई थी | मतलब आप समझिये की ९० का दशक में हिंदी की कविता युवायों से उरी तरह विदा हो गयी थी | नए इंजीनियरिंग कोल्ल्गे खु रहे थे नए लड़के B Tech में आ रहे थे और अंतर्राष्ट्रीय जो  गाने हैं वोह उन युवायों के पास पहुँच रहे थे | चुनौती बहुत बड़ी थी , क्योंकि जो उनके पास पहुँच रहा था वोह बहुत सरल था “ somebody loves you, somebody misses you every single night” , ऐसे में हमारे भारतीय भाषायों के जैसे हिंदी के जो कवी थे वो बदलने को तैयार नहीं थे | वोह तब भी अंतर्मन , उद्दगार , मानस उससे बहार नहीं आ रहे थे ……उसको दिल-विल बनाने में बहुत वक्त लगा बदल समझता है , मोहब्बत, एह्साह यह सब एक तरह  से वर्जित शब्द थे | पुराने ख्यालों के लोगों का कहता था की उर्दू क्यों लिख रहे हो हिन्दुस्तानी क्यों लिख रहे हो | यह थोडा मुश्किल काम था उसक विरोध सहना पड़ा , जो जमी जमाई पीढ़ी थी उसने इसका प्राण पण से विरोध किआ लेकिन अन्तत: जनता ने स्वीकार कर लिया तो वोह पूर्ण रूपेण स्वीकृत हो गया |

प्रश्न: आप फिल्मो के लिए लिख रहे हैं , क्या गा भी रहे हैं ?

उत्तर: फिल भैरवी के लिए अभी  दो गाने लिखे हैं , कुछ गाने और भी बातचीत के दौर में हैं , फिल्मो के लेखन में थोड़ी सी समस्या यह है की आप ताहिर बनाने की लिए गुरूदत्त चाहिए | अब गुरूदत्त की क्वालिटी की फिल्मे लोग बना नहीं पा रहे , या वो इतनी जल्दबाजी में हैं  या उन्हें मार्किट का इतना संघर्ष सहना पड़ रहा है की उन्हें किसी भी हालत में फिल्म को ९ महीने के अन्दर डिब्बे में बंद करके देना ही पड़ता हैं | ऐसे स्थिति में हम ऐसे गाने की उम्मीद नहीं कर सकते जैसे “ हमें मचाये कूचा बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह खरीददार की तरह “ या जैसा नीरज लिखते रहे हैं | आपको लोग एस डी बर्मन जैसे चाहिए, आर डी बर्मन जैसे चाहिए , जो आपकी भाषा के चमत्कार को समझ सकें पकड़ सकें | उम्मीद है को कुछ ने अच्छे समझदार लोग आ रहे हैं तो शायद उनके साथ शायद कुछ अच्छा कर पायुं |

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प्रश्न: हिंदी का फ़िल्मों में बेहाल है विशेषकर गानों में के परिवर्तन की कोई सम्भावना है ? क्योंकि उसका आमजन पर बेहद प्रभाव है ?

उत्तर: देखिये जब जब वहां अच्छे लिरिक्स ( lyrics) आते हैं जैसे सईद कादरी ने महेश भट्ट साहेब के लिए लिखे तो एकदम लोगों ने उठाये ,जब जब रहत फ़तेह अली खान ने पाकिस्तान के कोई गज़लकार की कोई गजल गा दी तो लोगों ने उसे स्वीकार किआ | यह कहना गलत है की वहां अच्छी कविता की संभावना नहीं है | अच्छी कविता वहां किसी ने प्रस्र्तुत नहीं की इसलिए ऐसा लग रहा है |

 प्रश्न: कविता और राजनीति कौन किस पर हावी रहता हैं , संतुलन कैसे बन पता है ?

उत्तर: देखिये कविता मह्त्य्वापूर्ण है लेकिन उससे आप लोगों में समाज में देश में मानक परिवर्तन नहीं कर पायेंगे | कविता उत्प्रेरक का काम कर  सकती  है लेकिन मूल जो अवयव है उनका काम नही  कर सकती , कविता किसी प्रक्रिया को शांत कर सकती है तेज कर सकती है लेकिन मानक परिवर्तन तो राजनीति से ही होगा | रहीम अकबर के दरबार में थे बस इतना काफी नहीं  है | अकबर होने  से ही रहीम ठीक से भाषा का उन्नयन कर पाए | राजनीति इसलिए युगधर्म है |

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प्रश्न: राजनीति से जुड़ने पर इतनी अवहेलना, इतना अपमान, इतनी गलियां , प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष एक कवी ह्रदय को झेलने की इतनी शक्ति कहाँ से आती है ?

उत्तर: पहले विचलित कराती थी चीजे अब भी करती हैं , लकिन फिर यह लगता है की अंतत: आप जो है कोई बड़ा काम कर रहे हैं तो रास्ते में यह तो मिलेगा | नीलकंठ तो होना पड़ेगा क्योंकि हमने तो कभी यह कभी देखा नहीं था सहा भी नहीं था | प्रशंसा ही प्रशंसा सुनी थी और अभी ही मैं देखत हूँ जो लोग , कला जगत के लोग जो राजनेतिक रूप से बिलकुल सजग नहीं है भारत को अपना देख नहीं मानते जिनके पास दोहरी नागरिकता हैं जिन्होंने संकट के समय हिंदुस्तान छोड़ भी दिया था , जिनकी खुद की आस्थाए ५ पैसे पर टिकी हुई हैं वोह ७० साल की उम्र पार करके भी यह कहते रहते हैं की ‘ establishment से नहीं लड़ना चाहिए’ | तो यह नायकत्व का मुहावरा इस देख में बदलेगा धीरे धीरे बदलेगा | और बदला भी है | आप समझिये १९३० के दशक में एक लड़के ने आकर बता दिया था की नायक क्या होता है उसने कह दिया था  की ‘ यह सब संवाद, सम्मलेन, गोल-मेज, लन्दन जायो , बात करो, साइमन गो – बेक ‘ ठीक है तुम सब करो पर ऐसे नहीं चलेगा’ | उसने घृणा सही ,उसें अपने आन्दोलन में ही अपने ही लोगों से घृणा सही | देश के सबसे बड़े नेता ने संपादकीय लिखा , की भटके हुए लडके है, हिंसा की राह पर चल रहे हैं | लेकिन अगर आज भारत  में आकलन कराया जाए जो पूरा वर्ग खिलाफ था उनके उस समय वोह आज उनके समर्थन में है इतिहास को प्रतीक्षा करनी पड़ी | नोटों पर न छपता हो भगत सिंह लेकिन दिलों में तो है ही |

प्रश्न: जीवन के ३० बसंत उपरांत अपने को एक कवी के रूप में और ‘आप’ को एक पार्टी के रूप में आप कहाँ देखना चाहते हैं ?

उत्तर: दोनों अलग अलग हैं , कवी के रूप में तो मैं अपने आपको एक बहुत ही ameture कवी मानता हूँ | मुझे लगता है की अच्छा लिखा जाना अभी बाकि है | और लगातार अच्छा न लिखा जाने में लोकप्रियता भी एक हिस्सा है | पिचले एक दशक में जीतनी लोकप्रियता मिली उसने निश्चित रूप से divert किआ | और आर्थिक असुरक्षा भी एक हिस्सा है | नौकरी, छोड़ नहीं सकते हैं , केवल कविता पाठ कर नहीं सकते हैं | फिर आन्दोलन आ गया , लेकिन राजनैतिक रूप से यह जरूर  मनाता हूँ की हमने एक परिपग्क्व राजनीती की | और १९७० के दशक के बाद जो आन्दोलन का अस्तित्व समाप्त हो गया था , एक नयी प्रकार की राजनीती की संभावना समाप्त हो गयी थी , हमारी पार्टी ने हमारे संगठन ने उसे जीवित किआ और लोगों में एक आशा आई की ‘कुछ हो सकता है’ |कुछ समय पहले तक लगता है की कुछ संभव नहीं है , कोई बदलाव नहीं हो सकता | राजनीती तो बस गुंडे ही करेंगे , मावली ही करेंगे , बड़े बापों के बेटे ही करेंगे , उसका मुहावरा बदला हैं | महाभारत में १८वे दिन दुर्योधन कहता है “ आशा बलवती राजन , श्ल्यु ज्येष्टि पंडवान “ तो आशा होनी बहुत आवश्यक है | इसीलिए दुर्योधन सीधा स्वर्ग जाता है और पांडव पहले नरक दर्शन को जाते हैं | तो इस पार्टी ने संगठन ने आशा बड़ी पैदा की | उम्मीद बहुत पैदा की , स्फूर्ति बहुत पैदा की इस राजनैतिक आन्दोलन ने |

 प्रश्न: इतना द्वेष , दंश और राजनैतिक घृणा के चलते कभी असुरक्षा का भाव नहीं पैदा होता ?

उत्तर: उससे आगे निकल आये अब,  असुरक्षा – वसुरक्षा, आत्म रक्षा के भय या भाव  से , ग़ालिब का एक शेर है दर्द का हद से गुजरना है दावा हो जाना | शुरू, शुरू में बहुत लगता था FIR हो गयी उसने अरोपे लगा दिया , किसी ने कुछ  लिख दिया , कुछ और गंद कर दी | अब इस सबसे आगे निकल आये | अब लगता  है की ठीक है यह इनकी हताशा का प्रतीक है , मैंने यह पंक्ति लिखी बड़ी मशहूर हुई की “ यह जो तुम्हारे हाथ में पत्थर छुरी और बेंत हैं – यह सब तुम्हारी हार के स्वीकार के संकेत हैं “ | जब जब वो पत्थर उठाये , छुरी उठायें , बेंत उठाये तब तब मान लीजिये उन्हने अपनी हार का उदघोष कर दिया |

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 प्रश्न: आप पर सारी  दुनिया के ‘आप’ समर्थकों को एक करने की जिम्मेदारी है यह भरोसा और भार आपके लिए क्या मायने रखता है ?

उत्तर: इस दायित्व का आत्मबल बहुत ज्यादा है | पूरी दुनिया से लोग मेल करते हैं , पूरी दुनिया से लोग मिलते हैं | सड़क पर लोग मिल जाते हैं दूसरे संगठन के लोग मिलते हैं वोह कहते है की आपसे बहुत आशाएं है , बड़ा आदर करते हैं | वोह २५-३०% लोग जो शुद्ध राजनीती कर रहे हैं , जिन्हें राजनीती का कारोबार करना है , वाही ऐसा कर रहे हैं |

 प्रश्न: बाहर बसे लोगों को आपसे बहुत अपेक्षाएं हैं, तालमेल की कमी, सामजस्य , संवाद सबसे बड़ी शिकायत है , इसको दूर करने की कोई  योजना है ?

उत्तर: पार्टी का यह दायित्व मुझे सौपना ही यह दर्शाता है की पार्टी की लीडरशिप इसको कितनी गंभीरता से ले रही है |इससे पहले पीछले चार वर्षों में आन्दोलन के दौरान कभी भी किसी वरिष्ठ नेता ने NRI का काम नहीं सम्हाला था | इसलिए पहले दिन मैंने उस NRI का नाम बदल कर रखा ‘AAP- Overseas’  | नॉन हटाया उसके सामने से यह नकारात्मक शब्द हटाया | और जबसे मैंने यह काम सम्हाला है तबसे २ गूगल हंग-आउट हो चुके हैं | ७ यात्राएँ मेरे जो co-convenor है आदर्श शास्त्री वो कर चुके हैं | मैं खुद आपके पास आ रहा हूँ  न्यूज़ीलैण्ड और ऑस्ट्रेलिया | उसके बाद मैं दुबई  और इंग्लैंड जा रहा हूँ | महीने में एक गूगल हंग आउट आवश्यक रूप से होगा हमारा |

 प्रश्न: पांच साल बाद की दिल्ली आप कैसी देखते हो ?

उत्तर: मैं समझता हूँ की ५ साल बाद नहीं ३-४ वर्ष बाद ही दिल्ली भारत का पहला भ्रष्टाचार मुक्त राज्य होगा | अभी तो क्या होता है की जैसे की शरीर में बीमारी बहुत ज्यादा हो और आप कोई एंटी –बायोटिक लें तो शरीर के सारे विषाणु उसे रोकने की कोशिश करते हैं की वोह  स्वस्थ ने हो जाये | ऐसे ही व्यवस्था का हर पोर-पोर आपके खिलाफ अभी लगा हुआ है | लकिन धीमे धीमे जो सर्कार काम कर रही है , सर्कार में जो मंत्रियों का जो दल काम कर रहा है , मुख्यमंत्री जो काम कर रहे हैं , और उनकी जीतनी गंभीरता हैं शनिवार-रविवार के दिन भी देर तक काम कर रहे हैं उससे लग रहा है की जो वडा उन्होंने लोगो और स्वम से किआ है उसे वोह पूरा करेंगे |

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 प्रश्न: भारतीय मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक अपनी  विश्वसनीयता के निम्नतम  स्तर पर है , क्या कहेंगे, क्या इसका निदान संभव है ?

उत्तर: इसका निदान तभी संभव है जब भारतीय मीडिया को सिर्फ मिडिया समूह रहने का नियम लाया जाए | वोह अपनी विश्वसनीयता के निम्नतम  स्तर पर इसलिए है  Indian Express के मालिक गोएंका जी सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस चलाते थे  सिर्फ अखबार ही चलते थे | जूते की दुकान नहीं थी उनकी साथ में | अब आज बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनकी खान भी हैं , बिजली भी बना रहे हैं , जो रियल स्टेट के  धंधे में भी हैं , चावल भी बेचते हैं | जिस समय वो वहां बईमानी चाहते हैं उस समय वोह उस बईमानी का पूरिकरण वोह यहाँ करते हैं | भारतीय मीडिया में विशेषरूप से कुछ संगठन , कुछ लोगों ने मैं यहाँ आपके पाठको के लिए उल्लेख करना चाहूँगा, विशेषरूप ‘जी समूह ‘ जैसे है दिल्ली में बिजली बेचना चाहता था | उनके मालिक ने दिल्ली में दबाब बनाया मुख्यमंत्री के ऊपर की हम बिजली बना रहे हैं हमसे बिजली ले लीजिये | जम बिजली तो वही लेंगे न जो सस्ती से सस्ती मिले और हमारे वोटर्स को फ़ायदा हो सके , और उसकी नाराजी उनके पास है इसलिए वो हमारे प्रति अपयश फैलाते हैं , गलत और गन्दी न्यूज़ चलते हैं | एक चैनल है  जिसके मालिक पहले कांग्रेस में थे , फिर बीजेपी में गए उनसे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं } एक चैनल  है जिसके मालिक विद्यार्थी परिषद् के चुनाव लड़ चुके हैं , आप उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं | ऐसे जो चैनल हैं उनसे आप क्या उम्मीद करेंगे , लेकिन अच्छी बात यह है  की धीमे धीमें दर्शक पहचान रहा है की यह वैकल्पिक मीडीया जिसे कहते हैं जैसे facebook, twitter इनकी विश्वस्न्नेयता ज्यादा बड़ रही है |

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 प्रश्न: आप पहली बार ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलेंड आ रहे हैं . कैसा महसूस कर रहे हैं और अपने प्राशंशकों से क्या कहना चाहेंगे ?

उत्तर: मैं ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलेंड के अपने तमाम पड़ने सुनाने वाले प्राशंशकों से यह कहना चाहूँगा की मैं वर्षीं से यहाँ आना  चाहता था | मुझे याद है की २००८ में मुझ एक मेल आया था सिडनी से की आप यहाँ आये नहीं हैं लेकिन यहाँ अप्रवासी साथियों में आप इतने लोकप्रिय है की मेरा ३ साल का बेटा है जिसे हम हिंदी जैसे तैसे सिखाने की कोशिश करते हैं , लेकिन उसने  आपका विडियो इतनी बार देखा है की  उसका पेन या पेंसिल या रबर खोने के बाद मिल जाती है तो वोह कहता है की ‘ अच्छा तो तुम यहाँ थी , मैं तो तुम्हे आगरे में ढून्ढ रहा था “| मेरा एक  जूमला उस बच्चे ओ याद हो गया | तो मुझे लगता  है की एक अच्छा टूर रहेगा | और मैं आपके Indianz X-PRESS आखबार मीडीय समूह को बधाई देता हूँ की जिन्होंने यह पहल की और मैं बहुत उत्सुक हूँ की ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलेंड के वे लोग जो भारत का नाम रोशन कर रहे हैं अपनी प्रतिभा , क्षमता और तपस्या से उनसे संवाद कर सकूँगा , उनका खूब  मनोरंजन कर सकूँगा और भारत का प्रणाम उन्हें पहुंचा सकूँगा |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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