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नीतीश कुमार फिर बनें बिहार के शहंशाह… विपक्ष तो छोड़िए, बीजेपी ने भी माना उनका लोहा!

 

बिहार में बीजेपी की आज की मजबूती उसे अपने एजेंडे को तेज करने के लिए प्रेरित कर सकती है और नीतीश इतने व्यावहारिक नेता हैं कि वे अपनी कुर्सी पर खतरा लेकर बीजेपी से टकराव मोल नहीं लेंगे।
बिहार चुनाव की तारीख का ऐलान होते ही तेजस्वी यादव बेहद आत्मविश्वास से भरे दिखे। उन्होंने दावा किया कि अब नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू का समय खत्म हो चुका है और जनता बदलाव चाहती है। नीतीश ने इस दावे का जवाब नहीं दिया। उनकी चुप्पी से उनकी सेहत और राजनीतिक भविष्य को लेकर तरह–तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं कि शायद चुनाव के बाद वे राजनीति से बाहर हो जाएं।
असहज नहीं हुए नीतीश – उधर, प्रशांत किशोर, जो कभी नीतीश के साथी थे और हर पार्टी के लिए रणनीति बना चुके हैं, अपनी नई पार्टी ‘जन सुराज’ के साथ पूरे बिहार में घूमते रहे। उन्होंने जाति और धर्म से ऊपर उठकर रोजगार, विकास और बुनियादी जरूरतों पर फोकस किया। माना जा रहा था कि ऐसे मुद्दों से नीतीश को असहज होना चाहिए था, लेकिन उन्होंने किशोर का लगभग कोई जवाब नहीं दिया।
चुनाव परिणाम चौंकाने वाले निकले – लेकिन चुनाव परिणाम चौंकाने वाले निकले। बीजेपी –जेडीयू गठबंधन को भारी जीत मिली, जिसने साफ कर दिया कि बिहार की जनता अभी भी 20 साल से चली आ रही नीतीश सरकार को जारी रखना चाहती है। बीजेपी की तुलना में छोटे साथी दलों के साथ अक्सर ऐसा होता है कि उनका कद घट जाता है, लेकिन बिहार में नीतीश की स्थिति उलट है, वे आज भी सेंटर में हैं। लग रहा है कि बीजेपी उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाएगी। जेडीयू ने 2020 के अपने 43 सीटों के प्रदर्शन को बढ़ाकर इस बार 75 सीटें पा लीं। हां, बीजेपी उससे 10 सीट आगे है, लेकिन आंकड़ों से ज्यादा दिलचस्प उनकी आपसी राजनीति है, जो पहले भी कई बार तनावपूर्ण रही है।
बीजेपी ने देर से ही सही, नीतीश को गठबंधन का चेहरा माना – पांच साल पहले, 2020 में, बीजेपी जेडीयू से 31 सीटें आगे थी। तब जेडीयू को शक था कि बीजेपी ने चिराग पासवान को अलग लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि नीतीश की ईबीसी और महादलित वोट-बैंक काटा जा सके और यह रणनीति काम भी कर गई। लेकिन इस बार बीजेपी ने ऐसी गलती नहीं दोहराई। उसने चिराग से लेकर छोटे-छोटे सहयोगियों तक सबको एकजुट रखा। बीजेपी ने देर से ही सही, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि गठबंधन का चेहरा नीतीश ही हैं।
नीतीश के साथ कितना सहज रहेगी बीजेपी? – अब सवाल यह है कि बीजेपी, जो इस चुनाव से बेहद मजबूत होकर निकली है, क्या आगे भी नीतीश के साथ पहले जैसी सहजता रखेगी? उसका सपना हमेशा से रहा है कि वह बिहार को अकेले भी जीत सके, जैसे उसने ओडिशा में बीजद को किनारे करके किया। लेकिन बिहार में स्थितियां अलग हैं, यहां बीजेपी नीतीश को एकदम हटाकर प्रयोग नहीं कर सकती क्योंकि नीतीश अभी भी जरूरी हैं। नीतीश के पुराने बीजेपी वाले दोस्त अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और सुशील मोदी अब नहीं रहे, लेकिन इस बदलाव ने भी उनके और प्रधानमंत्री मोदी के रिश्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
बिहार में दिलचस्प और बड़ा बदलाव – डबल इंजन सरकार की मदद से नीतीश ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं चलाई हैं, जैसे ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’। इससे उन्हें बड़े पैमाने पर महिला वोट मिले। स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल–ड्रेस योजना, शराबबंदी, स्थानीय निकायों और नौकरियों में महिला आरक्षण-इन सबने महिलाओं को एक मजबूत राजनीतिक समूह में बदल दिया है। कई संकेत यह भी मिलते हैं कि महिलाएं अब परिवार के पुरुषों के मुताबिक नहीं, बल्कि अपने फायदे को देखकर वोट दे रही हैं- यह दिलचस्प और बड़ा बदलाव है।