
प्रशांत महासागर में दबदबे के लिए अमेरिका और चीन में जंग चरम पर पहुंच गई है। हाल ही में जब अमेरिका में सालाना राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (NDAA) का फाइनल ड्रॉफ्ट जारी हुआ, तो सबसे अजीब बात थी-प्रशांत महासागर में एम्फीबियंस विमानों का एक पायलट प्रोजेक्ट। बताया जा रहा है कि प्रशांत महासागर में अमेरिका अपने सैन्य अड्डों पर बड़ी संख्या में साजो-सामान की कमी का सामना कर रहा है, जिसे पूरा करना उसके लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। दरअसल, चीन इस इलाके में अपनी मौजूदगी जबरदस्त तरीके से बढ़ा रहा है। प्रशांत महासागर में इन दो देशों का झगड़ा भारत के लिए भी टेंशन की बात हो सकती है, क्योंकि भारत के अपने हित हैं। इसे भी स्टोरी में समझते हैं।
चीन से कैसे पिछड़ रहा है अमेरिका – द वॉर जोन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका का यह नया पायलट प्रोजेक्ट शांति काल में रसद और खोज एवं बचाव के साथ-साथ युद्ध काल में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए बनाया गया है। प्रशांत महासागर के विशाल क्षेत्र में लगभग हर जगह समुद्री विमानों से पहुंचने की क्षमता का अभाव, चीन का सामना करने के लिए पेंटागन की बढ़ती क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण कमी है।
MC-130J विमानों को उड़ाना बंद कर दिया गया – रिपोर्ट के अनुसार, कुछ समय तक तैरने वाले विशेष अभियानों के लिए बने MC-130J विमान को पेंटागन द्वारा इस समस्या का समाधान या कम से कम एक संभावित समाधान माना जाता था। अंततः, वर्षों के विकास और निकट भविष्य में उड़ान परीक्षण के वादे के बाद, उस कार्यक्रम को 2024 में बंद कर दिया गया। प्रशांत क्षेत्र में अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जलचालित विमानों का उपयोग करने की अन्य पहलें भी हाल के वर्षों में बंद कर दी गई हैं।
चीन कैसे अमेरिका से आगे निकल रहा है – इस बीच, चीन उन्नत उभयचर विमान क्षमताओं में निवेश कर रहा है। क्षेत्र में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी जापान भी खोज और बचाव कार्यों और दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों तक पहुंच बनाने के लिए बेहद प्रभावशाली उभयचर विमानों ‘शिनमेवा यूएस-2’ का एक छोटा बेड़ा बनाए हुए है। ऐसे में माना जा रहा है कि संघर्ष के दौरान ये दोनों प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियां अपने ही क्षेत्र में लड़ रही होंगी। अमेरिका को लगभग एक सदी में अब तक के सबसे चुनौतीपूर्ण अभियान युद्ध का सामना करना पड़ेगा।
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