
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(ISRO) ने 12 जनवरी को इतिहास रचने जा रहा है। यह इतिहास PSLV-C62 मिशन के जरिये होना है। यह इसरो का श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर से 2026 का पहला ऑर्बिटल लॉन्च है। इस PSLV-C62 के जरिये EOS-N1 सैटेलाइट लॉन्च होना है, जिसे अन्वेषा नाम दिया गया है। यह हाइपर स्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है। यह कृषि, शहरी मैपिंग और पर्यावरण आकलन में रणनीतिक निगरानी करने के लिहाज से बनाया गया है।
अन्वेषा के साथ मॉरीशस, स्पेन के सैटेलाइट भी – अन्वेषा के अलावा 18 और छोटे-छोटे सैटेलाइट भी लॉन्च होने हैं। जिसमें भारत के साथ-साथ मॉरीशस, स्पेन और यूरोपीयन केस्ट्रल इनीशियल डिमॉन्स्ट्रेटर समेत कई देशों के सैटेलाइट भी हैं। इस लॉन्चिंग से भारत विदेशी सैटेलाइट प्रक्षेपण मार्केट में भी अपनी बादशाहत कायम करने की तरफ कदम बढ़ाने वाला है।
डीआरडीओ ने बनाया है ये सैटेलाइट – इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, मिशन भले ही इसरो लॉन्च करने जा रहा है, मगर इस अन्वेषा सैटेलाइट को डीआरडीओ ने बनाया है। अब तक जो सैटेलाइट भेजे जाते थे, वो रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट थे। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि ये सैटेलाइट रक्षा-सुरक्षा के मकसद से बनाए गए हैं। ये धरती की निगरानी करेंगे।
गगनयान और चंद्रयान मिशनों के लिए अहम – डॉ. विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, डीआरडीओ का यह अन्वेषा सैटेलाइट बेहद खास है। यह भारत की सीमाओं की निगरानी में बेहद अहम साबित होगा। यह मिशन रणनीतिक ज्यादा है। भारत के इस मिशन की कामयाबी आगे चलकर गगनयान और चंद्रयान मिशनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।
अन्वेषा ऐसे करता है काम – अन्वेषा पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए तस्वीरें लेगा इसमें हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और स्मार्ट कैमरे लगे हैं। ये हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर सैकड़ों बारीक स्पेक्ट्रल बैंड को पकड़ते हैं। ये मेटल, वाहन, पेड़, मिट्टी या इंसान अलग-अलग रंगों की रोशनी को अलग तरीके से रिफ्लेक्ट करके पकड़ लेते हैं। अन्वेषा इन रिफ्लेक्शन्स को एनालाइज करके छिपी हुई चीजें पहचान लेता है।
विनोद कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि रणनीतिक रूप से अन्वेषा पृथ्वी की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरें लेगा, जो सेना के लिए मैपिंग करने, दुश्मन की गतिविधियां ट्रैक करने और युद्ध की तैयारी में इस्तेमाल होंगी। यह पर्यावरणीय बदलावों को भी ट्रैक करेगा, जैसे जंगल में नई सड़कें या निर्माण, जो दुश्मन की योजना का संकेत हो सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाला डेटा कंप्यूटर से एनालाइज किया जा सकता है। इससे सेना को मिनटों में जानकारी मिलेगी। यह कृषि, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन में भी मदद करेगा। यह पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की सीमा पर दुश्मन की सैन्य गतिविधियों के बारे में सटीक जानकारी देगा।
बीते साल PSLV-C61 सफल नहीं हो पाया था – बीते साल मई, 2018 में इसरो ने PSLV-C61 मिशन भेजा था, मगर लॉन्चिंग के 8 मिनट बाद ही रॉकेट में धमाका हो गया था। पहले दो चरण सामान्य थे, मगर थर्ड स्टेज के दौरान चैंबर के प्रेशर में गिरावट आने से नुकसान हो गया था। इसके जरिये EOS-09 रडार इमेजिंग सैटेलाइट छोड़ा जाना था।
ये बातें अब भी कर रहीं परेशान – इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में कुछ बातें अब भी परेशान कर रही हैं। जैसे पोटेंशियल नॉजल कंट्रोल क्यों फेल हुआ। ठोस ईंधन वाले थर्ड स्टेज में केसिंग क्यों फूट गया? जबकि इस मामले में इसरो के चेयरमैन ऑफिस से कई बार जांच कराई जा चुकी है।
गगनयान और चंद्रयान मिशनों को लगा धक्का – एक्सपर्ट का आकलन है कि PSLV का रिकॉर्ड 94 फीसदी कामयाबी का रहा है। ऐसे में इसका आकलन किया जा रहा है। संसद के रिकॉर्ड में यह बात कही गई है कि सैटेलाइट के नुकसान से भारत के गगनयान और चंद्रयान मिशनों को धक्का लगा है।
Home / Uncategorized / चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश सीमा पर एकसाथ बजे ‘सायरन’? आज ऐसा क्या करने जा रहा है भारत
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