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मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकवादी संगठन, डोनाल्ड ट्रंप के ऐलान से UAE क्‍यों हुआ खुश, अमेरिकी बैन के मायने जानें


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। अमेरिका के इस फैसले का मतलब है कि ट्रांसनेशनल सुन्नी इस्लामी ग्रुप की लेबनानी, जॉर्डनियन और मिस्र की शाखाओं को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया है। यह समूह 1920 के दशक में मिस्र में स्थापित हुआ था और इसने पूरे क्षेत्र में इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों को जन्म दिया। ये विचारधारा इस्लामिक देशों में काफी लोकप्रिय और विवादित भी है। मुस्लिम ब्रदरहुड यानि जमात अल-इखवान अल-मुस्लिमीन को 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने स्थापित किया था, जिसकी विचारधारा ये है कि ‘इस्लाम ही समाधान’ है। इसका मकसद हर जगह शरिया कानून स्थापित करना है।
इसकी विचारधारा अरब और मुस्लिम दुनिया में लोकप्रिय और विवादित दोनों रही है। हालांकि मुस्लिम ब्रदरहुड के नेताओं का दावा रहा है कि उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है, लेकिन अभी भी मुस्लिम ब्रदरहुड कई तरह की मजहबी हिंसा में शामिल रहा है। इस विचारधारा को मानने वाले लोग भी दुनिया के कई देशों में हिंसक वारदातों को अंजाम देते रहे हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड का दावा है कि वो अब चुनाव और अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से इस्लामी शासन स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन इस ग्रुप के कई शाखाओं के पास हथियारबंद लड़ाके हैं। आलोचक इस संगठन को बहुत बड़ा खतरा मानते रहे हैं। अमेरिका के इस फैसले का संयुक्त अरब अमीरात ने स्वागत किया है, जबकि तुर्की के लिए ये एक बड़ा झटका है, क्योंकि राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन इस विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं।
मुस्लिम ब्रदरहुड क्या है , इसका मकसद क्या है? – अमेरिका ने 13 जनवरी को मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है, जिसका प्रभाव काफी ज्यादा होने वाला है। मुस्लिम ब्रदरहुड, अरब देशों में फैला एक कट्टर इस्लामिक मूवमेंट है और स्कूल टीचर से मजहबी नेता बने हसन अल-बन्ना ने इसकी स्थापना की थी। उनका मानना था कि इस्लामी विचारधारा ही शासन का आधार होनी चाहिए। शुरूआती दिनों में इसने सामाजिक आंदोलनों पर काम किया और फिर धीरे धीरे इसने इस्लाम के नाम पर हिंसा फैलाना शुरू कर दिया। इसके एक हथियारबंद समूह ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और इजरायल के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1948 में मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद फहमी अल-नोकराशी की हत्या में भी इसी संगठन का हाथ था। क्योंकि उन्होंने इस संगठन को गैर कानून घोषित कर दिया था। अल-बन्ना की काहिरा में हत्या कर दी गई।