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शास्त्रों के अनुसार, बिछिया पहनने से महिलाओं को होते हैं ये फायदे

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शादीशुदा मह‍िलाओं के बीच सोलह शृंगार का विशेष महत्‍व होता हैं और इन सोलह शृंगारों में 15वें पायदान पर पैर की अंगुलियों में बिछ‍िया पहने का रिवाज है। सामाजिक मान्‍यताओं के अनुसार शादी के बाद प्रत्येक महिला को बिछिया पहननी चाहिए। इसे पहनना शुभ माना जाता है।
आमतौर पर बिछिया चांदी की होती है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके वास्‍तविक पीछे कारण क्या है? महिलाओं का बिछ‍िया पहनना केवल यह प्रतीक नहीं है कि वे विवाह‍ित हैं, बल्‍ि‍क इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। आइए जानते हैं वे सभी कारण जिनके कारण महिलाओं का बिछिया पहनना अच्‍छा माना जाता है।

– अगर आप ध्यान दें तो पाएंगे कि बिछिया हमेशा दाहिने तथा बाएं पैर की दूसरी अंगुली में ही पहनी जाती है। यह गर्भाशय को नियन्त्रित करेगी और गर्भाशय में सन्तुलित ब्लड प्रेशर द्वारा उसे स्वस्थ रखेगी।

– दरअसल पैरों में बिछिया महिलाओं की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में बहुत अहम भूमिका निभाती है।

– आयुर्वेद में बिछिया के इस महत्व को समझा गया है और यही वजह है कि हमारी संस्कृति में विवाहित महिलाओं के लिए इसे पहनने का विधान है। आयुर्वेद में इसे मर्म चिकित्सा के अंतर्गत बताया गया है। आयुर्वेद की मर्म चिकित्सा में महिलाओं में फर्टिलिटी बढ़ाने के लिए बिछिया के महत्व को माना गया है।

साइटिक नर्व की एक नस को बिछिया दबाती है जिस वजह से आस-पास की दूसरी नसों में रक्त का प्रवाह तेज होता है और यूटेरस, ब्लैडर व आंतों तक रक्त का प्रवाह ठीक होता है।

– भारतीय वेदों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इन्हें दोनों पैरों में पहनने से महिलाओं का मासिक चक्र नियमित होता है।

– बिछिया एक्यूप्रेशर का भी काम करती है, जिससे तलवे से लेकर नाभि तक की सभी नाड़िया और पेशियां व्यवस्थित होती हैं।
– भारतीय महाकाव्य रामायण में बिछिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था तो उन्होंने अपनी बिछिया को भगवान राम की पहचान के लिए फेंक दिया था। यह दर्शाता है कि बिछिया का उपयोग प्राचीन काल से ही होता रहा है।
– चांदी एक अच्छी सुचालक है इ‍सलिए यह पृथ्वी की ध्रुवीय ऊर्जा को ठीक करके शरीर तक पहुंचाती है जिससे पूरा शरीर तरोताजा हो जाता है।
– आजकल फैशन के तौर पर दो या तीन अंगुलियों में भी बिछिया पहनते हैं। दोनों पैरों की दूसरी और तीसरी उंगली में बिछिया पहनने से सिएटिक नस का दबाव बढ़ता है और इस वजह से आसपास की नसें जो यूटेरस व प्रजनन तंत्र से जुड़ी हैं, इनमें रक्त प्रवाह ठीक रहता है और यूटेरस का संतुलन बना रहता है।

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