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‘अमेरिका ने चुराया हमारा तेल’, ट्रंप के फैसले पर भड़का चीन, वेनेजुएला के कच्चे तेल पर महायुद्ध शुरू


दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच अब ऊर्जा और संसाधनों को लेकर सीधी जंग छिड़ गई है। ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों के बीच वहां फंसे करीब 5 करोड़ बैरल कच्चे तेल को अमेरिकी रिफाइनरियों में भेजने और बेचने का ऐलान किया है। इस कदम ने बीजिंग को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है।
चीन क्यों है नाराज? – दरअसल, यह तेल केवल वेनेजुएला की संपत्ति नहीं था। चीन ने सालों से मादुरो शासन के साथ ‘तेल के बदले कर्ज’ (Loan-for-Oil) के कई समझौते किए थे। चीन का दावा है कि इस तेल के एक बड़े हिस्से के लिए वह पहले ही अरबों डॉलर का भुगतान कर चुका है। ट्रंप के इस फैसले से चीन का वह पैसा और निवेश अब डूबता नजर आ रहा है।
ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ दांव – ट्रंप प्रशासन ने चीन के दावों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है।
ब्लॉकेड तोड़ना: अमेरिका ने वेनेजुएला की नाकेबंदी को अपने पक्ष में मोड़ते हुए तेल के टैंकरों का रास्ता वॉशिंगटन की ओर मोड़ दिया है।
एनर्जी सिक्योरिटी: ट्रंप का तर्क है कि इस तेल का इस्तेमाल अमेरिकी रिफाइनरियों में होगा, जिससे घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें कम होंगी और अमेरिकी दबदबा बढ़ेगा।
भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात – यह विवाद केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण अमेरिका (लैटिन अमेरिका) में वर्चस्व की लड़ाई है।
वर्चस्व की जंग: मादुरो शासन के कमजोर पड़ने के बाद वेनेजुएला के भविष्य पर कौन नियंत्रण रखेगा, यह कदम उसी का हिस्सा है।
चीन का नुकसान: इस फैसले से चीन को न केवल अरबों डॉलर का वित्तीय घाटा हुआ है, बल्कि इस क्षेत्र में उसकी रणनीतिक पकड़ भी ढीली हुई है।
वॉशिंगटन का दबदबा: अमेरिका ने यह संदेश दे दिया है कि लैटिन अमेरिका के संसाधनों पर अब वही ‘कॉल’ लेगा।