
जापान और चीन के रिश्ते पिछले सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। हालिया तनाव की शुरुआत पिछले साल नवम्बर में जापान की पीएम साने ताकाइची के एक बयान से हुई थी, जिसमें उन्होंने ताइवान पर चीन के हमले को जापान के अस्तित्व के लिए खतरा बताया था। ताकाइची ने कहा कि ताइवान पर हमला काफी है कि जापान भी जवाबी कार्रवाई करे। ताकाइची के बयान पर चीन तिलमिला उठा था और उसने ताइवान की तरफ देखने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। इसके बाद से बीजिंग जापान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इस बीच ताकाइची ने जापान के चुनाव में ऐतिहासिक रूप से मजबूत जनादेश के साथ वापसी की है, तो विश्लेषक दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ने की चेतावनी दे रहे हैं।
चीन की ताइवान पर तिलमिलाहट – ताइवान पर चीन अपना दावा करता है और उसे अपने साथ मिलाने के लिए ताकत के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया है। लंबे समय से चिंता रही है कि ताइवान पर किसी भी हमले का नतीजा चीन और अमेरिका के बीच सीधे सैन्य टकराव में बदल सकता है, क्योंकि वॉशिंगटन ने ताइपे की रक्षा का वादा किया है। क्षेत्र में जापान और फिलीपींस जैसे अमेरिकी सहयोगी भी इसकी जद में आ सकते हैं।
वहीं, ताइवान को चीन रेड लाइन मानता है और बाहरी दखल की किसी भी टिप्पणी पर सख्ती से रिएक्ट करता है। चीन का कहना है ताइवान उसकी संप्रभुता का मामला है, जिसका फैसला वह खुद कर सकता है। ताकाइजी के बयान से चीन की नाराजगी अभी तक खत्म नहीं हुई है। हाल ही में म्यूनिक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इसका जिक्र किया। चीनी विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि जापान में सैन्यवाद का भूत लौट रहा है और कहा कि अगर जापान फिर से जुआ खेलता है तो उसे तेज हार का सामना करना पड़ेगा।
जापान का झुकने से इनकार – चीन की आपत्तियों के बावजूद ताकाइजी ने अपनी बात वापस लेने या माफी मांगने से इनकार कर दिया था। इसके बाद चीन अपना दबाव बहुत बड़े मोर्चे पर बढ़ाया है। रॉबर्ड वार्ड थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज में जापान मामलों के चेयरपर्सन हैं। उन्होंने कहा कि चीन का दबाव फैला हुआ और कम लेवल का है, जो ताइवान पर उसके ग्रेजोन फॉरफेयर जैसा है।
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