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क्राइस्टचर्च हादसा : कठिन परिस्थितियों में मानवता और सेवा का ऐसा स्वरूप ही हमें एक बेहतर इंसान बनने को प्रेरित करता है – संजीव कोहली

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इंटरव्यू : अलोक गुप्ता

प्रश्न: क्राइस्टचर्च हादसे के दौरान आपके लिए क्या चुनौतियां थी और आपने उन्हें कैसे संभाला?
उत्तर: सबसे पहली और बड़ी चुनौती तो पहले ही दिन, घटना की प्रमाणिक सूचना प्राप्त करना थी| शहर पूरा लॉक डाउन अवस्था में था| जो भी सूचना मिली वह अपने समुदाय के माध्यम से मिली जिसका की बहुत सारा श्रेय उनको जाता है| दूसरी बड़ी चुनौती भारत और यहां के बीच टाइम डिफरेंस की थी क्योंकि भारत से हमें, उन्हे सूचना भेजने का अत्यधिक दबाव था| चूंकि हमे त्वरित, प्रमाणिक जानकारी नहीं मिल पा रही थी अतः हम उसे किसी भी तरह से भारत के प्रचार माध्यमों को, मीडिया को नहीं दे सकते थे| यही स्थिति हमारे मंत्रालय के लिए भी थी| मुझे ध्यान है कि मैं और मेरे हाई कमीशन के तीन प्रमुख अधिकारी तो, पहली तीन रात सो ही नहीं पाए थे| मृतकों की और घायलों की सूचना और उसकी प्रमाणिकता का बहुत दबाव था| दिल्ली से मीडिया की इंक्वायरी, मृतक और घायलों के नामों की पुष्टि उनके परिवारजनों के आने की वीजा व अन्य व्यवस्था आदि बहुत बड़ी चुनौतियां थी|
हमने दो हेल्पलाइन नंबरों की व्यवस्था की थी जो 24 घंटे एक्टिवेटेड रही उन पर निरंतर जानकारी प्राप्त करने वालों की इंक्वायरी थी| हमारे लिए सबसे मुश्किल बात यह थी कि,जब तक हमारे पास प्रमाणिक सूचना नहीं थी, हम उसे आधिकारिक तौर पर बता नहीं सकते थे और नहीं बता पाने की स्थिति में प्रश्न यह उठता था कि आपको पता क्यों नहीं है| क्योंकि हम, हमारे समुदाय और वहां के डॉक्टर के माध्यम से जानकारी ले रहे थे इसीलिए हम उसे प्रमाणिक तौर पर प्रसारित नहीं कर सकते थे | अतः पहले 48 घंटे, दिल्ली और मीडिया का काफी दबाव रहा|
2 दिन के बाद जब स्थिति थोड़ी सी स्पष्ट हुई और हमें मृतकों और घायलों की औपचारिक नाम और सूची प्राप्त हुई तो फिर हमने उस पर काम करना तेजी से शुरू किया| हालांकि तब हम पर दिल्ली से यह दबाव था कि हम सूची के नाम प्रसारित ना करें क्योंकि अगर उसमें कोई फेरबदल होती है, तो अनावश्यक लोगों में बेचैनी और घबराहट की स्थिति पैदा होगी| स्वाभाविक था कि विभिन्न माध्यमों से मिली खबरों के कारण क्राइस्टचर्च के भारत में रहने वाले रिश्तेदार और परिवार वालों में बहुत बेचैनी का माहौल था, इस सब के चलते शुरुआत के तीन चार दिन हम सब निरंतर बहुत दबाव में रहे|
उसके बाद जब परिवार के सदस्य और रिश्तेदारों का आना शुरू हुआ तो उनकी सुचारु व्यवस्था आदि करना का दायित्व हमारे ऊपर आया| यहां यह कह कर मैं बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि जिस तरह की मदद हमें हमारे समुदाय से इस भीषण और भयावह त्रासदी के दौरान मिली वह असाधारण और दिल को छू लेने वाला अनुभव था| जिस तरह से क्राइस्टचर्च में रह रहे हमारे देशवासियों ने वॉलिंटियर्स के रूप में अस्पताल में और अन्य स्थानों पर अपने लोगों की मदद की वह सराहनीय और अनुकरणीय थी| लोगों ने व्हाट्सएप पर ग्रुप बनाकर कब, कहां, किस को किस चीज की जरूरत है उसे निस्वार्थ रूप से पूरा करने का सहज भाव से बीड़ा उठाया| युवा लड़कियों ने अस्पताल में भर्ती घायलों की सेवा के लिए स्वयं निर्मित रोस्टर के माध्यम से आवश्यकतानुसार समय दिया|
अभी थोड़े समय पहले मैं एक जगह बैठा था तो मुझे इस्लामिक फेडरेशन के कुछ लोग कह रहे थे कि देखिए साहब हमने इतना काम किया, हमने यह किया हमने वो किया|तो मैंने उनसे कहा कि आपने बहुत कुछ किया होगा लेकिन जहां तक मुझे जानकारी है आपका तो कोई बंदा जाकर घायलों के साथ हॉस्पिटल में नहीं बैठता था| 90% लोग जो हॉस्पिटल में घायलों की सेवा में लगे थे वह ना उस एरिया के थे और ना ही उस धर्म के थे| यही हमारी कम्युनिटी की ताकत है| हमारे लोगों ने धर्म और जाति और किसी भी स्वार्थ से ऊपर उठकर ऐसे मुश्किल समय में जो आचरण दर्शाया है वह अलौकिक था| मानवता और सेवा का ऐसा स्वरूप ही हमें कठिन परिस्थितियों में एक बेहतर इंसान बनने को प्रेरित करता है|
दुर्भाग्यवश, इस हादसे में जिन लोगों की मृत्यु हुई वह प्रमुख रूप से हैदराबाद गुजरात और केरल के मुस्लिम समुदाय के लोग थे| लेकिन आप देखें कि सिख एसोसिएशन के लोगों ने अपनी गाड़ियां फ्री में लगाई हुई थी| सिख एसोसिएशन, लोगों को सामूहिक तौर पर िनशुल्क खाना खिला रही है अनजान लोग जा जा कर जिसको जब समय मिल रहा है जहां जरूरत है वहां अपनी सेवाएं दे रहे हैं| यह बात, अक्सर खबरें नहीं बनाती हैं लेकिन इंसानियत का यही जज्बा आपको बहुत शक्ति और आत्मविश्वास देता है कि दुनिया चाहे कैसी भी हो, इसमें आज भी अच्छे और नेक इंसानों की कमी नहीं है| लोग भले ही कहते हो कि भारत में इस समय टॉलरेंस की कमी है लेकिन मेरा कहना है कि यही सच्चा भारत और भारतीयता है| हमें किसी को यह बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि हम कैसे हैं एक भारतीय होने के नाते अगर कोई देशवासी दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी मुश्किल में है तो हम निस्वार्थ बिना सोचे समझे उसकी सेवा करने में अपनी खुशकिस्मती समझते हैं|फिर चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या समुदाय विशेष का क्यों ना हो|
प्रश्न: जसिन्डा आडर्न ने एक प्रधानमंत्री के रूप में जिस तरीके से इस घटना पर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन किया उस पर आपका क्या मत है?
उत्तर: उन्हें उनके आचरण पर सारी दुनिया से सराहना मिली है जिसकी कि वह पूरी तरह हकदार हैं| जिस तरह उनकी सरकार ने उन मुश्किल क्षणों में अपने दायित्व और जिम्मेदारियों को पूरी कुशलता से निभाया वह अनुकरणीय हैं|
जिस तरह से उन्होंने घृणा और द्वेष से भरे उस जघन्य कृत्य की भर्त्सना की और लोगों को धर्म और दुर्भावना से ऊपर उठकर एक रहने पर बल दिया वह भी असाधारण था| मुझे लगता है उन्होंने एक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता से उन मुश्किल क्षणों में अपने आप को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का नेता साबित किया है|