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खालिदा जिया: सत्ता, संघर्ष और विवादों से भरा रहा राजनीतिक सफर, भारत से कैसे रहे रिश्ते?


बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख नेता बेगम खालिदा जिया का निधन हो गया है। उन्होंने 80 साल की उम्र में आखिरी सांस आज सुबह करीब 6 बजे ली। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति के एक लंबे और निर्णायक अध्याय का अंत हो गया। खालिदा जिया न सिर्फ देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं, बल्कि उन्होंने तीन बार सरकार का नेतृत्व किया और दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति को दिशा दी। लंबे समय से बीमार चल रहीं खालिदा जिया का इलाज देश और विदेश में चल रहा था।
बेगम खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को दीनाजपुर जिले में हुआ था। जब साल 1981 में उनके पति और बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई तो उन्होंने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। हालांकि उस वक्त राजनीति उनके लिए बिल्कुल एक नई पहेली थी, फिर भी पति की मौत के बाद उन्होंने बीएनपी की कमान अपने हाथों में ले ली और जल्द ही देश की ताकतवर नेताओं में से एक बन गईं। साल 1991 में वो पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। वो बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं।
बेगम खालिदा जिया का तीसरा कार्यकाल 2001 से 2006 तक रहा। इस दौरान उन्होंने मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था, निजीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान दिया, लेकिन दूसरी तरफ उनकी सरकार भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, प्रशासन की कमजोरियां और कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा देने के आरोपों में घिरती चली गई। जिससे जनता का उनसे मोहभंग भी होना शुरू हो गया। शेख हसीना के साथ उनकी राजनीति प्रतिद्वंदिता लगातार कड़वी होती चली गई और दोनों नेताओं के बीच आखिर आखिर तक गहरे मतभेद रहे। बेगम खालिदा जिया की सरकार गिरने के बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए गये और फिर उन्हें जेल भी जाना पड़ा। हालांकि गंभीर बीमारी की वजह से उन्हें सक्रिय राजनीति से हटना पड़ा। वहीं, उनकी पार्टी को भी शेख हसीना ने मुख्य धारा की राजनीति से धीरे धीरे दूर कर दिया।
बेगम खालिदा जिया को साल 2018 में भ्रष्टाचार के मामलों में जेल भेज दिया गया। इस दौरान उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता चला गया। हालांकि उनकी पार्टी और परिवार ने बार बार शेख हसीना की सरकार से उनके बेहतर इलाज के लिए विदेश भेजने की मांग की, लेकिन शेख हसीना ने मांग को खारिज कर दिया। वहीं, अब जबकि शेख हसीना की सरकार का पतन हो चुका है और अगले साल फरवरी महीने में बांग्लादेश में चुनाव होने हैं, तो ऐसे वक्त में उनका जाना राजनीति के लिहाज से काफी मायने रखता है। उनके बेटे तारिक रहमान 17 सालों तक निर्वासित जिंदगी जीने के बाद वापस बांग्लादेश लौट आए हैं। जबकि खालिदा जिया के छोटे बेटे अराफात रहमान कोको की कुछ साल पहले मलेशिया में मौत हो गई थी।
साल 1960 में खालिदा जिया की शादी जियाउर रहमान से हुई, जो उस समय पाकिस्तान सेना में कैप्टन थे। शादी के बाद भी उन्होंने 1965 तक दिनाजपुर के सुरेंद्रनाथ कॉलेज में अपनी पढ़ाई जारी रखी और उसके बाद वो कुछ सालों के लिए अपने पति के साथ रहने के लिए पाकिस्तान चली गईं। उस वक्त बांग्लादेश भी पाकिस्तान का ही हिस्सा था। जब 1971 में जब बांग्लादेश की आजादी के लिए मुक्ति संग्राम शुरू हुआ तो जियाउर रहमान ने पाकिस्तान की सेना के खिलाफ विद्रोह किया और युद्ध में हिस्सा लिया। 30 मई 1981 को जियाउर रहमान की हत्या के बाद, BNP एक गंभीर संकट में फंस गई। इस मुश्किल समय में, खालिदा जिया, जो पहले कभी राजनीति में नहीं थीं, वो पार्टी में शामिल हुईं और 12 जनवरी 1984 को इसकी वाइस-प्रेसिडेंट बनीं। उन्हें 10 मई, 1984 को BNP का चेयरपर्सन चुना गया। जनवरी 2010 में उन्हें फिर से पार्टी का चेयरपर्सन चुना गया।