
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2025 को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 84 बन गई है) की संवैधानिकता को बरकरार रखा है। कोर्ट ने माना कि भले ही इस कानून के दुरुपयोग के कुछ मामले सामने आए हैं, लेकिन घरेलू क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के लाखों असली मामले आज भी मौजूद हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानून के दुरुपयोग की आशंका मात्र से उसे कमजोर या रद्द नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर एक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें इस धारा को लिंग-तटस्थ बनाने और इसकी संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने जनश्रुति (पीपुल्स वॉयस) नामक संस्था द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई एक याचिका को खारिज कर दिया। अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के हनन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है। याचिका में घरेलू हिंसा की शिकायतों के लिए लिंग-तटस्थ दिशानिर्देश बनाने और धारा 498A की संवैधानिकता को चुनौती देने की मांग की गई थी।
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