
सुप्रीम कोर्ट , मुख्य रूप से संवैधानिक व्याख्या और तत्काल आपराधिक अपीलों के मामलों के लिए जिम्मेदार है। हालांकि, देश की सर्वोच्च अदालत में अभी 3,500 से अधिक जनहित याचिकाओं का बोझ है। इनमें से 698 याचिकाएं 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। सबसे पुरानी याचिका पर 42 वर्षों से कोई फैसला नहीं हुआ है। विधि मंत्रालय की ओर से साझा की गई जानकारी के अनुसार, इनमें से अधिकांश जनहित याचिकाएं पर्यावरण, भूमि कानून और कृषि मामलों से जुड़ी हैं।
PIL को लेकर कानून मंत्रालय ने दिया बड़ा अपडेट – संवैधानिक कोर्ट में सबसे अधिक 570 जनहित याचिकाएं 2025 में स्वीकार की गईं। इससे शीर्ष अदालत में 80,000 से अधिक केस का बोझ और बढ़ गया। पिछले पांच साल में सर्वोच्च न्यायालय 1,872 जनहित याचिकाओं का निपटारा करने में सफल रहा है, लेकिन यह लंबित मामलों को निपटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पिछले हफ्ते लोकसभा को सूचित किया कि 10 मार्च तक सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित जनहित याचिकाओं की कुल संख्या 3,525 है। जनहित याचिकाओं के निपटारे में लगने वाला औसत समय ज्ञात नहीं है।
याचिकाओं को लेकर कानून मंत्री ने दी अहम जानकारी – केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि 2014 के बाद से दायर की गई लंबित जनहित याचिकाओं की सबसे अधिक संख्या 2025 में सामने आई।
2025 में कुल 570 याचिकाएं दायर की गई हैं।
इसके बाद 347 याचिकाएं 2019 में दायर की गईं।
2020 में 306 और 2026 में 293 याचिकाएं दायर की गईं।
सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन सबसे पुरानी जनहित याचिका 1984 में दायर की गई थी।
वहीं दो अन्य याचिकाएं 1985 से लंबित हैं।
ये तीनों याचिकाएं एमसी मेहता बनाम भारत यूनियन से संबंधित हैं।
इनमें से दो पर्यावरण कानूनों से और एक आवास और भवन नगरपालिका कानूनों से संबंधित है।
कोर्ट की अवमानना से जुड़ी दो PIL लंबित – अदालत की अवमानना से संबंधित दो जनहित याचिकाएं- इकबाल अंसार बनाम कल्याण सिंह में मोहम्मद हाशिम (मृतक) और एस बी चौहान बनाम असलम @भूरे, क्रमशः 1995 और 1996 से लंबित हैं। इन जनहित याचिकाओं को दायर करने वाले कई लोगों का निधन हो चुका है, जबकि उनके मामले अभी भी विचाराधीन हैं।
Home / News / सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं 3500 से ज्यादा जनहित याचिकाएं, एक तो 42 साल पुरानी… विधि मंत्रालय की रिपोर्ट
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