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इंदौर की बेटी और खंडवा की बहू, मध्य प्रदेश से आशा भोंसले का वो नाता, जो कोई नहीं जानता


सुरों की जादूगरनी और भारतीय संगीत की सबसे बहुमुखी आवाज, आशा भोंसले ने रविवार को दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने से संगीत के एक युग का अंत हो गया है। हालांकि मध्य प्रदेश के दिल में उनकी यादों का एक गहरा समंदर हमेशा लहरें मारता रहेगा। इंदौर में जन्मी बड़ी बहन लता को सभी इंदौर की बेटी मानते थे। इसी वजह से आशा ताई को भी इंदौरी प्यार से इंदौर की बेटी ही मानते हैं। उनकी दूसरी शादी पंचम दा से हुई। पंचम दा और किशोर कुमार के बीच सगे भाइयों जैसा अटूट रिश्ता था। इस लिहाज से तकनीकी रूप से न सही, पर संगीत के पारिवारिक ढांचे में किशोर दा का घर यानी खंडवा में आशा जी के लिए हमेशा एक ससुराल जैसा ही सम्मानजनक स्थान रहा।
जब भोपाल की झीलों पर ठहर गई आशा ताई की निगाहें – आशा भोंसले का मध्य प्रदेश से पेशेवर रिश्ता तो था ही, लेकिन उनका निजी लगाव कहीं अधिक गहरा था। साल 2011 का वह दृश्य आज भी पुराने भोपालियों की आंखों में तैर जाता है, जब वे मध्य प्रदेश स्थापना दिवस के मौके पर लाल परेड ग्राउंड पहुंची थीं। कार्यक्रम में देरी हुई, हेमा मालिनी का नृत्य चल रहा था, लेकिन हज़ारों की भीड़ टस से मस नहीं हुई। रात के 12 बजने को थे, पर जैसे ही आशा ताई माइक पर आईं, पूरा भोपाल मंत्रमुग्ध हो गया। उन्होंने मंच से ही स्वीकार किया था कि उन्हें भोपाल की शांत फिज़ा और यहां की झीलों से प्यार हो गया है।
दिखा सादगी का वो इंसानी चेहरा – शिक्षाविद् और वरिष्ठ कला समीक्षक विनय उपाध्याय उस सुबह को याद करते हैं जब आशा जी एक फाइव स्टार होटल में ठहरी थीं। वे बताते हैं, ‘उनके बालों में एक ताज़ा गुलाब था और चेहरे पर वही शरारती मुस्कान। उन्होंने चलते समय मेरा हाथ थाम लिया, जैसे कोई पुराना परिचय हो। एक महान कलाकार की ऐसी सादगी देख मैं दंग रह गया। उन्होंने वहां मौजूद युवा गायकों को समझाया कि वे उस मिट्टी का सम्मान करें जिसने किशोर कुमार और लता मंगेशकर जैसे दिग्गजों को जन्म दिया है।’
क्यों खास था MP से नाता? – मध्य प्रदेश सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि आशा जी के लिए उनके परिवार की जड़ों का विस्तार था। 1989 में जब उन्हें राज्य सरकार का प्रतिष्ठित ‘लता मंगेशकर सम्मान’ मिला, तब उन्होंने भावुक होकर कहा था कि बड़ी दीदी के नाम का सम्मान उन्हें घर वापसी जैसा अहसास कराता है। वे हमेशा मानती थीं कि एमपी के श्रोताओं में सुरों की जो समझ है, वह देश में कहीं और नहीं।