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इजरायल-ईरान संबंधों का दिलचस्प इतिहास, कभी यहूदी देश ने तेहरान को बेचे थे हथियार, एक्‍सपर्ट से जानें


इस्राइल और ईरान के रिश्तों को समझने के लिए ट्रिटा पारसी (Trita Parsi) की किताब ‘Treacherous Alliance’ पढ़नी चाहिए। इसमें ट्रिटा बताते हैं कि कभी ये मुल्क परदे के पीछे दोस्त हुआ करते थे। वहां से किस तरह से दोनों के संबंधों में तल्खी आई और फिर दोनों के बीच युद्ध भी हुए। अभी अमेरिका के साथ मिलकर इस्राइल एक और युद्ध ईरान के खिलाफ लड़ रहा है। ट्रिटा ने इस किताब को लिखने के लिए इस्राइल, ईरान और अमेरिका के कई शीर्ष अधिकारियों से बात की है। वह बताते हैं कि बाहर से भले ही यह आइडियोलॉजिकल वॉर लगे, लेकिन यह सच नहीं है। दोनों देशों के संबंध भू-राजनीति और राष्ट्रीय हितों से निर्देशित होते रहे हैं।
किताब में बताया गया है कि जब ईरान में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी की सत्ता थी, तब इस्राइल और ईरान काफी करीब थे। तब दोनों ने इराक और इजिप्ट जैसे देशों के खिलाफ हाथ मिलाया था। मोसाद और ईरान की खुफिया एजेंसी SAVAK इस क्षेत्र में आ रहे सोवियत संघ के हथियारों के बारे में आपस में सूचनाएं साझा करती थीं। यही नहीं, इस्राइल तब ईरान से तेल खरीदता था और बदले में उसे हथियार देता था।
70 के दशक की दोस्ती – कृषि क्षेत्र में काफी मदद करता था उनकी। 1973 में जब अरब देशों ने तेल की बिक्री रोकी थी, तब इस्राइल के लिए ईरान इसका अहम जरिया था। ट्रिटा के मुताबिक, दोनों ने उस दौर में प्रॉजेक्ट फ्लावर नाम से मिलकर मिसाइल बनाने की योजना भी शुरू की थी। उनका कहना है कि इसकी वजह भी थी। अरब देशों के बीच यहूदियों का मुल्क होने की वजह से इस्राइल अलग-थलग था, जबकि ईरान ऐसा गैर-अरब मुल्क था जो ताकतवर था।
यह दोस्ती 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद टूट गई। तब शाह को पद छोड़ना पड़ा और अयातुल्लाह खुमैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बने। खुमैनी ने इस्राइल को ‘छोटा शैतान’ घोषित किया, जबकि अमेरिका उनके लिए ‘बड़ा शैतान’ था। हालांकि, इस्लामिक रिपब्लिक बनने के बाद भी ईरान और इस्राइल के रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे।
इजरायल ने दिए हथियार – ट्रिटा लिखते हैं कि 1980-88 के बीच जब ईरान का इराक के साथ युद्ध चल रहा था, तब इस्राइल ने गुपचुप तरीके से ईरान को 50 करोड़ डॉलर के हथियार बेचे थे। इनमें अमेरिका में बने F-4 लड़ाकू विमानों के कलपुर्जे भी शामिल थे। दरअसल, उस वक्त इस्राइल को सद्दाम हुसैन कहीं ज्यादा खतरनाक लगते थे।
ट्रिटा का मानना है कि अमेरिकी नीतियों की वजह से भी ईरान से अलगाव हुआ और उससे दुश्मनी बढ़ी। उन्होंने लिखा है कि 9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद ईरान ने अल कायदा के बारे में सूचना देने की पेशकश की थी। उसने परमाणु हथियार बनाने को लेकर पश्चिम और इस्राइल की चिंता दूर करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन, तब अमेरिका में जॉर्ज बुश की सरकार थी और उसने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।