
करीब डेढ़ साल लंबी अनिश्चितता के बाद बांग्लादेश ने आखिरकार लोकतंत्र को चुना। इस चुनाव का इंतजार उसी दिन से था, जब छात्रों के आंदोलन की वजह से शेख हसीना को पद छोड़ना पड़ा और अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली। हालांकि यह सवाल हमेशा रहेगा कि क्या बांग्लादेश को इसी तरह का लोकतंत्र चाहिए था?
अवामी लीग की दूरी – देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब शेख हसीना की पार्टी चुनाव में नहीं है। यह अवामी लीग का अपना फैसला नहीं था, बल्कि उस पर थोपा गया। जो पार्टी बांग्लादेश की मुक्ति से लेकर अभी तक, उसके हर राजनीतिक-सामाजिक बदलाव की साक्षी रही है, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर करना सही तो नहीं कहा जा सकता।
जनमत संग्रह – पाकिस्तान से आजादी मिलने के बाद इस चुनाव को बांग्लादेश के भविष्य के लिहाज से सबसे अहम माना जा रहा है। बहुत कुछ इसके परिणाम पर निर्भर करेगा कि ढाका की अपने देश को लेकर और बाहर भी – खासकर भारत के प्रति नीति क्या रहने वाली है। चुनाव के साथ जुलाई चार्टर को लेकर जनमत संग्रह भी हुआ है। इससे साफ होगा कि बांग्लादेश किस तरह की व्यवस्था में आगे बढ़ता है। ये लाइनें लिखे जाने तक वोटिंग परसेंट करीब 48 था। खबरों के मुताबिक, कई जगह तय समय के बाद भी लाइन लगी थी।
हिंसा की खबरें – चुनाव के पहले बांग्लादेश में जिस तरह के हालात थे, उसे देखते हुए मतदान को काफी हद तक शांतिपूर्ण कहा जा सकता है। कुछ जगहों से हिंसा की खबरें आई हैं। एक जगह बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता की मौत हुई। हालांकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा चिंता का विषय है।
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