
द्वितीय विश्वयुद्ध के नायकों में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल का नाम भी शामिल है। लेकिन क्या उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए? ‘Advance Britannia: The Epic Story of the Second World War, 1942-1945’ नाम की किताब में एलन ऑलपोर्ट (Alan Allport) ने इसी पहलू पर रोशनी डाली है। यह उनकी किताब ‘Britain at Bay,’ की सीक्वल है, जिसकी काफी सराहना हुई थी। एलन ने ‘Advance Britannia’ में द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के सफर का हाल बयां किया है।
रूजवेल्ट की धमकी – किस तरह से युद्ध में El Alamein की जंग से एक अहम मोड़ आया और वहां से मित्र देशों की जीत में चर्चिल के देश की क्या भूमिका रही। एलन लिखते हैं कि इस युद्ध में ब्रिटेन कोई नायक नहीं था बल्कि मित्र देशों के अलायंस में जो मुल्क शामिल थे, उनमें अमेरिका और सोवियत संघ का दबदबा रहा।
एलन यह भी लिखते हैं कि मित्र देशों के अलायंस के बीच भी सबकुछ ठीक नहीं था। ब्रिटेन के ऐहतियाती रुख से अमेरिका सहमत नहीं था। ब्रिटिश फौज ने एशियाई मोर्चों पर गलतियां कीं और रूजवेल्ट ने इंपीरियल ब्रिटेन के कुछ औपनिवेशिक इलाकों पर कब्जा करने की सांकेतिक धमकियां तक दी थीं। कई देशों के मिलकर लड़े गए इस युद्ध में ब्रिटेन एक सर्वाइवर रहा। यानी उसे अपना वजूद बचाने में कामयाबी मिली।
इस तरह से एलन की यह किताब चर्चिल के ब्रिटेन को लेकर कई मिथकों को ध्वस्त करती है। किताब बताती है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में वह एक ऐसा साम्राज्य था, जिसका पतन हो रहा था। तब की दुनिया में वैश्विक स्तर पर नई दोस्तियां भी सामने आ रही थीं।
एलन ने किताब की शुरुआत 1942 के आखिर से की है, जब ब्रिटेन को El Alamein में जीत मिली और इसने ब्रिटिश फौज में नई जान डाल दी। इसके तुरंत बाद ब्रिटेन को युद्ध में अपनी स्थिति की सचाई का अहसास भी हो गया। इस जंग के केंद्र में तब उत्तरी अफ्रीका से लेकर इटली के इलाके तक शामिल थे। एलन लिखते हैं कि युद्ध एक तरफ नॉरमंडी के बीचों पर लड़ा जा रहा था तो दूसरी ओर पैसिफिक के आसपास के इलाकों में।
युद्ध के दौरान ब्रिटेन के घरेलू हालात के बारे में भी एलन ने बताया है। वह लिखते हैं कि तब देश में चीजों की राशनिंग चल रही थी और मजदूर संकट का भी उसे सामना करना पड़ रहा था। किताब में चर्चिल का एक अलग ही चरित्र उभरता है। एलन के लिखे से यह बात तो सामने आती है कि वह शानदार रणनीतिकार थे, लेकिन चर्चिल साम्राज्यवादी भी थे। खासतौर पर भारत की स्वतंत्रता को लेकर उनका क्या रुख था, इससे तो हम सब वाकिफ हैं ही। दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट उपनिवेश बनाने वालों और औपनिवेशिक सत्ता के हिमायतियों के विरोधी थे। मित्र देशों में शामिल सोवियत संघ में तब स्टालिन की सत्ता थी और उनकी दिलचस्पी भी देश की सीमाओं के विस्तार में थी।
उपनिवेशों से मिली चुनौती – किताब लिखने के लिए एलन ने सार्वजनिक किए गए गोपनीय दस्तावेजों, डायरियों और ब्रिटिश सरकार की चिट्ठियों का सहारा भी लिया है। इनकी मदद से वह बताते हैं कि जर्मनी और पश्चिम यूरोप में किए गए हमलों से मित्र देशों को रणनीतिक रूप से मामूली फायदा ही हुआ। हकीकत यह भी थी कि युद्ध के दौरान ब्रिटेन में राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ रही थी। वहां अमीर और गरीब वर्गों के बीच तनाव बढ़ रहा था। ब्रिटेन के उपनिवेशों की स्थिति भी ठीक नहीं थी। भारत में बंगाल तब अकाल से जूझ रहा था, जबकि अफ्रीका में साम्राज्यवादी ब्रिटेन को विद्रोह का सामना करना पड़ रहा था। ब्रिटेन ने इन वजहों से द्वितीय विश्व युद्ध में जो कीमत चुकाई, उसे जीत के बाद भुला दिया गया।
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