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48 घंटे और कैसे बदला अमेरिका का रुख… क्या रही सऊदी की भूमिका?


भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की सूचना अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने से आश्चर्य हुआ। अमेरिकी नेतृत्व पिछले 48 घंटों से दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ संपर्क में था। सऊदी अरब ने भी तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनके विदेश प्रतिनिधि ने दिल्ली और पाकिस्तान का दौरा किया।
भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की सूचना जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से दी गई वो चौंकाने वाली थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और मार्को रूबियो के बयानों से लगता है कि अमेरिकी नेतृत्व बीते 48 घंटों से भारत और पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ संपर्क में था। रूबियो का कहना है कि वो और खुद जेडी वेंस ने भारत में पीएम मोदी और पाकिस्तान में शहबाज शरीफके साथ संपर्क बना रखा था। इसके साथ ही पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के साथ वॉशिंगटन डीसी का प्रशासन बात कर रहा था।
हालांकि एक दिन पहले ही वेंस ने फॉक्स न्यूज को कहा था कि भारत और पाकिस्तान संघर्ष मूलत: उनका बिजनेस नहीं है। वेंस ने कहा था कि अमेरिका दोनों ही देशों को डि- एस्कलेट करने के लिए कह सकता है। लेकिन हम युद्ध के बीच में संलिप्त नहीं होना चाहते। वेंस ने ये भी कहा था कि इसे कंट्रोल करने का अमेरिका की क्षमता से कोई संबंध नहीं है। यानि रुबियो के शनिवार के बयान के मुताबिक जब वेंस ये बात कह रहे थे, उस वक्त वो और उनका विदेश प्रशासन दोनों देशों के उच्च नेतृत्व के साथ संपर्क में बना हुआ था।
खास बात ये है कि ट्रंप के हालिया प्रशासन ने इस बात के संकेत कई बार दिए हैं कि प्रशासन अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के बीच उलझना नहीं चाहता। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपने प्रचार के दौरान भी ट्रंप ने ये बात कई बार कही थी और सत्ता में आने के बाद उनके इसी रुख की छाप उनकी विदेश ति में भी दिखी। ये अलग बात है कि उनके पहले कार्यकाल में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का ऑफर किया था। जिसे भारत की ओर से कोई तवज्जो नहीं मिली थी । सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार ने ये शनिवार को कहा कि सीजफायर द्विपक्षीय मसला है, तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं थी।
सऊदी की भूमिका और ईरान की रुचि- दो दिन पहले यानि गुरुवार को दो बड़े देशों के विदेश प्रतिनिधि दिल्ली में थे। ईरान और सऊदी अरब पहले वो दो देश थे जिन्होंने सबसे पहले मथ्यस्थता का ऑफर दिया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अगारची पहले पाकिस्तान गए और उसके बाद भारत आए। लेकिन गुरुवार को जब सऊदी विदेश राज्य मंत्री अल जुबैर भारत आए तो उनका दौरा बिना किसी शेड्यूल के था, उन्होने इस दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात भी की .अल जुबैर भारत दौरे के बाद पाकिस्तान भी गए थे।
दोनों देशों से किया संपर्क – वहीं सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान भी ना सिर्फ भारतीय बल्कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के भी संपर्क में बने हुए थे। शनिवार को उन्होंने दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बात की, लेकिन उससे पहले भी उन्होंने पाकिस्तान और भारत के विदेश मंत्रियों को फोन लगाया था। जिस के बारे में विदेश मंत्री जयशंकर ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा भी था कि उनकी सऊदी अरब के विदेश मंत्री से बात हुई थी । उन्होंने कहा कि उन्हें आतंक की क्रॉस बॉर्डर कड़ियों के बारे में जानकारी दी गई।
सऊदी अरब ने क्या किया? – दरअसल जानकार पहले से ही कह रहे थे कि सऊदी अरब, दोनों देशों के बीच की टेंशन को कम करने को लेकर गंभीरता से कोशिशें कर रहा है और दूसरे किसी देश के मुकाबले वो इसमें ज्यादा कामयाब भी साबित हो सकता है। उसकी वजह , उसके दोनों देशों के साथ रिश्ते है। खासतौर से बीते दिनों पीएम मोदी की खाड़ी देशों की आउटरीच और सऊदी के साथ भारत के आर्थिक रिश्तों में गाढ़ापन भी एक बड़ी वजह है। शनिवार को सऊदी सरकार की ओर से इस बात को स्वीकारा गया कि जुबैर की यात्रा, द्विपक्षीय टेंशन को कम करने से जुड़ी थी।