
पश्चिम एशिया में हालिया तनाव और उसके बाद हुए सीजफायर ने क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीति के कई नए संकेत दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम में जहां ईरान की स्थिति पहले से मजबूत होकर उभरी है, वहीं अमेरिका, चीन, रूस और पाक की भूमिकाएं भी चर्चा में आई हैं।
‘ईरान की स्थिति मजबूत होकर उभरी’ – पूर्व विदेश सचिव शशांक ने बताया कि पश्चिम एशिया में जिस तरह सीजफायर हुआ, उससे ईरान की स्थिति पहले से बेहतर दिखाई देती है। ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि रूस ने पश्चिमी देशों से कहा है कि यदि यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने पर बात होगी, तो वह ईरान को भी तनाव कम करने के लिए कह सकता है।
‘पाकिस्तान और चीन की सक्रियता’ – ऐसी रिपोर्ट आ रही थीं कि दिखाना स्वाभाविक था । यदि ईरान के परमाणु संस्थानों पर हमला होता, तो उसका गंभीर और जानलेवा प्रभाव पड़ोसी देशों पर पड़ सकता था। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान पर भी असर पड़ना तय था। इसलिए पाकिस्तान और चीन का अमेरिका से बातचीत में रुचि दिखाना स्वाभाविक था।
‘अमेरिकी लोकतंत्र में विरोध के संकेत’ – अमेरिकी नेताओं की ओर से ट्रंप के बयानों का जिस तरह विरोध किया गया, उससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सक्रियता बनी हुई है।
अमेरिका के खिलाफ बढ़ा असंतोष, ईरान को फायदा’ – पश्चिम एशिया मामलों के जानकार कमर आगा ने बताया कि इस युद्ध के बाद अमेरिका के खिलाफ माहौल बना है। US के भीतर भी विरोध के स्वर देखने को मिले। गाजा के समर्थन के बाद से ही ईरान की स्थिति मजबूत हो रही थी। US घोषित उद्देश्य, सत्ता परिवर्तन को हासिल नहीं कर पाया।
‘किसके पक्ष में घटनाक्रम’ – यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन होता, तो मध्य पूर्व में चीन और रूस की स्थिति कमजोर हो सकती थी। इसलिए चीन ने सक्रिय भूमिका निभाई, क्योंकि ईरान की स्थिरता उसके हित में है। पाक संदेशवाहक की भूमिका में रहा।
‘राजनीति में क्या बदला’ – मध्य पूर्व में सऊदी अरब और ईरान शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। युद्ध में रूस और चीन की ओर से ईरान को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता रहा। ऐसे में क्षेत्रीय समीकरण बदलेंगे।
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