
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि मध्यस्थता रिश्तों को बचाने का उन्नत रूप है। उन्होंने वकीलों को नई तकनीक और साइबर अपराधों पर प्रशिक्षण देने के लिए राष्ट्रीय विधि अकादमी बनाने का सुझाव दिया। अदालतों को विवाद समाधान का केंद्र बनाने पर जोर दिया गया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि मुकदमेबाजी अक्सर टूटे हुए रिश्तों का पोस्टमॉर्टम होती है, जबकि मध्यस्थता रिश्तों को बचाने की कोशिश करती है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर अपराधों से जुड़ी नई चुनौतियों से निपटने के लिए देशभर के वकीलों को खास ट्रेनिंग देनी चाहिए।
उन्होंने शुक्रवार को कहा कि इसके लिए एक राष्ट्रीय स्तर की विधि अकादमी बनाई जानी चाहिए, ताकि वकील नई तकनीक और कानूनों को बेहतर ढंग से समझ सकें और समय के साथ खुद को तैयार कर सकें। मध्यस्थता पर उन्होंने जोर देकर कहा कि अच्छा मीडिएटर वही होता है, जो केवल भाषा ही नहीं, बल्कि स्थानीय बोली, संस्कृति और भावनाओं को भी समझता हो।
अदालतों को बनाया जाए विवाद समाधान का केंद्र – गोवा में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित मेडिएशन पर राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि मध्यस्थता कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे उन्नत रूप है। इससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सकता है। अब वक्त आ गया है जब अदालतों को केवल मुकदमे चलाने की जगह न मानकर विवाद समाधान का केंद्र बनाया जाए।
मेडियेटरों की अदालतों में भारी कमी: CJI – उन्होंने ‘ मल्टी-डोर कोर्टहाउस ‘ की अवधारणा को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया, जिसमें मध्यस्थता, ट्रिब्यूनल और मुकदमेबाजी तीनों के विकल्प एक ही छत के नीचे उपलब्ध हों। CJI ने कहा कि जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ट्रेंड मेडियेटर की भारी कमी है। देश में अभी करीब 39 हजार ट्रेंड मीडिएटर है, जबकि प्रभावी व्यवस्था के लिए 2.5 लाख से ज्यादा मध्यस्थों की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि न्याय मांगने वाला व्यक्ति जब अदालत पहुंचे, तो उसके सामने पहले मध्यस्थता और पंचाट के विकल्प हों और जरूरत पड़ने पर मुकदमेबाजी का रास्ता खुला रहे।
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