
सुप्रीम कोर्ट ने किसी शख्स के मृत्यु से पहले दिए बयान को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बयान देने और मौत के बीच समय बीत जाने या मैजिस्ट्रेट की गैरमौजूदगी में बयान दर्ज होने पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा मौत से पहले दिए गए किसी शख्स के बयान को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि बयान देने और उसकी मौत के बीच कुछ समय बीत गया हो। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसे बयान को मान्य होने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह मौत के ठीक पहले या मौत के डर में दिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह शामिल थे। बेंच ने कहा कि मृत्यु से पहले किसी इंसान का बयान किसी मैजिस्ट्रेट की मौजूदगी में ही रिकॉर्ड होना जरूरी नहीं है। साथ ही, अगर डॉक्टर यह सर्टिफाई न करे कि बयान देने वाला मानसिक रूप से ठीक था, तो भी उस बयान को स्वीकार किया जा सकता है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसे बयान नहीं माने जा सकते क्योंकि मरने वाले ने बयान देने के लगभग दो महीने बाद दम तोड़ा था।
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