
ई-बुक के दौर में भी छपी किताबों की मांग बनी हुई है। प्रकाशक नए पाठकों को जोड़ने के लिए नए विषयों और लेखकों पर ध्यान दे रहे हैं। इतिहास, समाजशास्त्र और जीवनी जैसी विधाएं लोकप्रिय हो रही हैं। Gen-Z पीढ़ी को करियर और मानसिक स्थिरता से जुड़ी किताबें पसंद आ रही हैं।
राम त्रिपाठी: ई-बुक के आने से प्रिंटेड साहित्य और किताबों के भविष्य पर खतरे की आशंका बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि परंपरागत किताबों के पाठक कम हो गए हैं। इसलिए, अब प्रकाशन समूह भी नए जमाने के पाठकों को साधने के लिए उनके पसंदीदा विषयों पर जोर दे रहे हैं। Gen-Z पाठकों को किताबों से जोड़ने के लिए भी प्रकाशक नए तौर-तरीके आजमा रहे हैं।
दौर बरकरार । राजकमल प्रकाशन के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक माहेश्वरी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उन्हें लगता है कि छपी किताबों का रुतबा बरकरार है। प्रिंट की दुनिया कभी खत्म होने वाली नहीं है। लेकिन, वाणी प्रकाशन की CEO अदिति माहेश्वरी बताती हैं कि कोरोना के समय ई-बुक की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा था। मगर, अब पाठक दोबारा किताबें खरीदने लगे हैं।
प्रिंट प्रामाणिक । प्रिंट की मजबूती का कारण पूछने पर अशोक बताते हैं कि प्रिंट भरोसेमंद है। खबर सच है या नहीं यह आज भी अखबार से ही पता चलता है। नए जमाने की किताबों पर अदिति बताती हैं कि आज कहानियों के अलावा साहित्य की मांग है। लोगों की दिलचस्पी इतिहास, समाजशास्त्र और जीवनी पढ़ने में है। LGBTQ+ विषयों से जुड़ी किताबें भी खूब बिक रही हैं।
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