
जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया तो द्रौपदी के पांचों पुत्रों को द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने सोते हुए में मार डाला। द्रौपदी चीत्कार कर उठीं। उनके पांचों पुत्र मृत अवस्था में पड़े हुए थे। द्रौपदी हाहाकार कर उठीं। अर्जुन क्रोध में भर कर बोले, मैं अश्वत्थामा की गर्दन काट कर लाता हूं। तू दुख मत मान।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण की मदद से अश्वत्थामा को रस्सियों से भली प्रकार बांधकर द्रौपदी के सम्मुख खड़ा कर दिया। अश्वत्थामा को देखते ही भीम ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘इस दुष्ट को तत्काल मार डालूंगा। इसे एक पल भी जीवित रहने का अधिकार नहीं है।’’
द्रौपदी और रोने लग गईं। वह कहने लगीं, ‘‘मेरे पुत्र तो अब मर चुके हैं। अश्वत्थामा को मार डालने से मेरे पुत्र जीवित तो नहीं हो सकते। पुत्रों की मृत्यु हो जाने पर मां के दिल पर क्या गुजरती है, इस दर्द का अहसास मुझे है। मैं नहीं चाहती कि इनकी पूजनीय माता कृपी देवी को भी पुत्र शोक सहना पड़े। अत: अश्वत्थामा का आप सब अहित न करें।’’
द्रौपदी का हृदय कितना विशाल है। द्रौपदी अपने पुत्र के हत्यारे अश्वत्थामा को भी क्षमा कर देती हैं। वहीं द्रौपदी दु:शासन और दुर्योधन को क्षमा नहीं कर पातीं। द्रौपदी को दु:शासन बाल खींचकर घसीटते हुए भरी राजसभा में लाया था और दुर्योधन के आदेश पर उन्हें निर्वस्त्र करना चाहा था। इस गलती के लिए द्रौपदी दु:शासन और दुर्योधन को क्षमा नहीं कर सकीं। दुर्योधन ने अपनी बाईं जंघा दिखलाते हुए कहा था, ‘‘आ, द्रौपदी! मेरी इस जंघा पर बैठ।’’ द्रौपदी ने उसे कभी क्षमा नहीं किया।
दु:शासन उसके बालों को पकड़कर घसीटते हुए लाया था, जिससे उसके बाल खुल गए थे। उसने अपने बालों को खुले ही रखा और शपथ ले ली कि ‘जिस दु:शासन ने मुझे बेआबरू करना चाहा है, उस दु:शासन के लहू से जब तक मैं अपने बालों को धो न लूं, तब तक अपने बालों को नहीं बांधूगी।’
द्रौपदी अपने शत्रुओं को तो क्षमा करती है, पर मानवीय मूल्यों पर कुठाराघात करने वालों को क्षमा नहीं करती।
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