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चीन के जबड़े से लद्दाख सीमा पर चोटियां छीनने वाली गुरिल्ला आर्मी बनाई, अमेरिका-भारत संबंधों का बीजू ने बोया बीज


ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA का एजेंट बताने वाले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने विवाद के बाद भले ही माफी मांग ली हो, मगर बात सिर्फ यहीं पर खत्म नहीं होती है। बीजू पटनायक देश के विजनरी पुरुष थे। उनके ही बताए मॉडल पर भारत ने बाद में विकास बटालियन की नींव रखी गई, ताकि चीन से लोहा लिया जा सके। उन्होंने ने ही भारत-अमेरिका संबंधों की नींव रखी।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को शुरुआत में भले ही चीन दुश्मन नहीं लगा, मगर एक हस्ती ऐसी थी, जिसे चीन पर कभी भरोसा नहीं था। उसे चीन के विश्वासघात के बारे में पक्का यकीन था। ओडिशा के पूर्व सीएम और देश की आजादी में निर्णायक भूमिका निभाने वाले बीजू पटनायक इस मुद्दे पर नेहरू से अलग थे। बीजू ने ही चीन के विश्वासघात को समझ लिया था। इसलिए वह भारत की सेना के लिए ठोस रणनीतिक कदम उठाना चाहते थे। जब उन्हें यह मौका मिला तो उन्होंने अपने आइडिया को अमली जामा पहनाने में सब कुछ दांव पर लगा दिया। बीजू पटनायक ने ही भारत-अमेरिका संबंधों की नींव रखी।
चीन को लेकर आक्रामक थे बीजू पटनायक – दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बतौर पायलट बीजू पटनायक ने कई चुनौतीपूर्ण मिशनों को अंजाम दिया था। उन्होंने असम से चीन के लिए तब च्यांग काई शेक की फोर्स के लिए सप्लाई लेकर उड़ान भरी थी। पटनायक का चीन को लेकर नजरिया बेहद आक्रामक था। उन्होंने भारत की रक्षा पंक्ति की मजबूती के लिए अमेरिका का सहयोग लेना ज्यादा मुनासिब समझा।
नेहरू ने बीजू को अमेरिका भेजा – 1962 में चीन से मिले धोखे के बाद नेहरू ने बीजू पटनायक को सैन्य सहयोग के लिए अमेरिका भेजा था। पटनायक का दौरा तब हुआ, जब उनसे कुछ समय पहले ही राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन अमेरिका का दौरा कर चुके थे। किताब-Biju Patnaik: The Rainmaker of Opposition Politics के अनुसार, यह वह दौर था, जब बीजू पटनायक पायलट से पॉलिटिशियन बन रहे थे। ये उनके कद में बड़े बदलाव का दौर था।
भारत-अमेरिका संबंधों का बोया बीज – उसी वक्त भारत-अमेरिका संबंधों का बीज बोया गया था। जो सही मायनों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जाकर और मजबूत हो गया।
1963 में नेहरू ने एक सवाल के जवाब में पटनायक की भूमिका के बारे में कहा था-वह ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके पास विचारणीय आइडिया, अनुभव, जमीनी अनुभव है, जो यहां बैठे हममें से शायद ही किसी में हो। निश्चित रूप से ऐसा किसी में नहीं है।
बीजू की रणनीतिक सोच का नतीजा विकास बटालियन – 2020 में जब गलवान घाटी संघर्ष हुआ तो उस वक्त SFF (स्पेशल फ्रंटियर फोर्स) जिसे विकास बटालियन कहा जाता है, ने अहम भूमिका निभाई थी। यह बटालियन बीजू की रणनीतिक सोच का नतीजा थी।
इस बटालियन में तिब्बती सैनिक होते हैं, जो पहाड़ों की लड़ाई में बेहद अनुकूल होते हैं। ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के तहत भारत ने उस वक्त लद्दाख में चीन सीमा के पास पैंगोंग त्सो झील के पास रेजांग ला और रेचिन ला चोटियों पर कब्जे का अभियान चलाया था।
कैलाश हिल्स को भी अपने कब्जे में कर लिया – इन चोटियों से उस इलाके में चीन की आर्मी पर नजर रखी जा सकती है, जिसने तब उस इलाके में चौकियां बना ली थीं।
विकास बटालियन ने कैलाश हिल्स को कब्जे में करने के अभियान में भी हिस्सा लिया था, जिसे चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने अपने कब्जे में कर लिया था।
इस तरह की कोवर्ट फोर्स बनाने का मौलिक आइडिया सबसे पहले बीजू पटनायक ने ही दिया था।