
दुनियाभर से विद्वानों और दक्षिण एशिया के विशेषज्ञों की एक समिति ने पाकिस्तान को जिहाद और आतंकवाद की विचारधारा से दूर ले जाकर उसकी एक ‘‘नयी छवि” बनाने के आयामों को तलाशा, जिसमें विदेश में रह रहा पाकिस्तानी समुदाय भी कुछ भूमिका निभा सकता है। ‘जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर यूके’ थिंक टैंक और लंदन में ‘इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ द्वारा आयोजित ‘रीइमेजिंग पाकिस्तान : ए ग्लोबल पर्सपेक्टिव’ कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि पाकिस्तान की तथाकथित ‘‘जिहाद नीति” गुजरे जमाने 1947 की बात है जब उसने ‘‘कश्मीर पर जबरन कब्जा” करने की कोशिश की थी।
समिति के सदस्यों के बीच इस बात पर आम सहमति थी कि धन शोधन पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) द्वारा पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखने के मद्देनजर उस पर तेजी से अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ रहा है। ऐसा होने से पहले फौरन कुछ कदम उठाए जाए और चीन क्षेत्र में अपने आर्थिक हितों को देखते हुए इसमें कुछ मदद कर सकता है। दक्षिण एशिया में राजनीतिक बहुलवाद को बढ़ावा दे रहे स्वतंत्र समूह ‘लिबर्टी साउथ एशिया’ के सेथ ओल्डमिक्सन ने कहा, ‘‘पाकिस्तान के पास क्षेत्र में अपने आप को एक नेता के तौर पर पेश करने का अनोखा अवसर है।
करतारपुर कोरिडोर अच्छी शुरुआत है लेकिन उसे जिहाद की विचारधारा से अलग जाकर एक नयी छवि बनाने की जरूरत है।” उन्होंने कहा, ‘‘पाकिस्तान इस विचारधारा से बंध गया है और इसके दीर्घकालिक हित देश की छवि सुधारने में है या फिर उस पर तेजी से अलग-थलग होने का खतरा है।” जॉर्जटाउन यूनिविर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. क्रिस्टिन फेयर ने कहा, ‘‘अमेरिका को पाकिस्तान को दी जाने वाली सभी वित्तीय सहायता बंद करने की जरूरत है क्योंकि यह मदद खतरनाक है।”
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