
आम चुनाव में हिंदुत्व की कमंडल राजनीति के सामने एक बार फिर मंडल की जाति राजनीति समांनतर रूप से उभरी, जिसने बीजेपी को अपने दम पर बहुमत पाने से रोका। इस साल 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद जब बीजेपी हिंदुत्व लहर के सहारे तीसरे टर्म में भी 300 पार की उम्मीद कर रही थी, विपक्ष ने हिंदू बेल्ट में अपनी मंडल की सोशल इंजीनयरिंग की बदौलत उस लहर को रोक दिया। एनडीए के हिंदुत्व को विपक्ष ने जातीय समीकरण से काउंटर करने की कोशिश की।
यह एक तरह से 90 के दशक की पुनरावृत्ति हो गई जब राम मंदिर आंदोलन की बदौलत उभरी बीजेपी को रोकने में मंडल आंदोलन सफल हुआ था। दरअसल हिंदी पट्टी में सालों से सवर्णों के हाथों में सत्ता रहने के बाद यह नब्बे के दशक में पिछड़ों के बीच ट्रांसफर हुई। 90 के दशक में कमंडल से पहले मंडल आया था। पिछड़ों को आरक्षण देने वाले मंडल कमीशन की सिफारिश लागू होने के बाद देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।
अगड़े बनाम पिछड़े की लड़ाई ने इसकी शक्ल को पूरी तरह बदल दिया। ठीक उसी समय अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने जैसी घटना और जय श्री राम के नाम पर राजनीति से कमंडलवाद भी उफान पर आया पर मंडल रथ पर सवार लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, मायावती जैसे नेताओं ने बीजेपी को रोका।
इस बार भी कहीं न कहीं नरेन्द्र मोदी, योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं के शीर्ष काल में अखिलेश, तेजस्वी जैसे नेताओं ने सोशल इंजीनियरिंग की। टिकट देने में यही रणनीति अपनाई। उसका लाभ भी दिखा।
Home / Uncategorized / जाति ने तोड़ी धर्म की दीवार, लौटा मंडल बनाम कमंडल का दौर, रिजल्ट का मतलब समझिए
IndianZ Xpress NZ's first and only Hindi news website