
एक बार की बात है एक बहुत महान संत हुआ थे जो अपने शिष्य के साथ रहते थे। एक बार उनके प्रांगण में उनका एक भक्त आया। उसने उन्हें प्रणाम करते हुए उन्हें एक बहुत कीमती पियाला भेंट किया और कहा कि, “हे संत महाराज मेरी ओर से इस तुच्छ भेंट को स्वीकार करें।”
संत ने वो पियाला स्वीकार कर लिया और उसे अपने शिष्य को देते हुए उसे कहा कि आज के बाद तुम मुझे जो भी खाना देना वो इसी में देना। परंतु इसका उपयोग बहुत ही सावधानी से करना ताकि इसे खरोंच भी न आए।
शिष्य ने अपनी गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए रोज़ाना उन्हें उसी पियाला में खाना देने लगा। एक दिन वो उस पियाले को साफ़ कर रहा था कि वो पियाला उसके हाथ से छूटकर नीचे गिरा और दो टुकड़ों में बंट गया। अब शिष्य बहुत घबरा गया उसे लगा अाज तो मेरी खैर नहीं। गुरू देव ने मुझे खासतौर पर इस पियाले को संभालने के रखने को कहा था लेकिन मैंने इसे तोड़ दिया।
ये सब विचार करता हुआ शिष्य घबराता पियाले के उन दोनों टुकड़ो को अपने हाथ में पीछे करके छिपाकर संत के पास गया और बोला गुरुदेव आप कहते हैं न ही हर किसी का अंत निर्धारित होता है।
क्या ये सच है? संत ने उसकी बात का जवाब देते हुए कहा ,”हां पुत्र ये सच है।”
फिर शिष्य ने कहा कि आप कहते हैं दुनिया में मौज़द हर कीमती चीज़ एक न एक दिन ज़रूर टूटती है।
क्या ये भी सच है? संत ने उत्तर दिया, ”हां ये भी सत्य है।”
अब शिष्य ने कहा कि आप कहते हर प्राणी की हर वस्तु की एक निर्धारित उम्र है, जो एक न एक दिन खत्म होगी।
ये भी सत्य है? संत ने मुस्कुराते हुए कहा, ”हां बिल्कुल।”
संत के इस उत्तर को सुनते हुए शिष्य ने दोनों हाथ करते हुए कहा, तो महाराज एेसा समझ लीजिए कि इस पियाले की भई उम्र हो गई थी। इसलिए इसका भी अंत हो गया।
अपने शिष्य की ये बात सुनकर संत हंसने लगे और कहने लगे, ”सही कहा तुमने बात बेटा इस पियाले की उम्र हो गई थी और उसे गले लगा लिया।”
सीख- जो इंसान किसी कीमती चीज़ मिलने पर अहम में न आए, और न ही किसी कीमती वस्तु के खत्म होने का शौक मनाए भागवत में उस व्यक्ति को ही असली भक्त कहा जाता है।
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