
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि वह युग जब कुछ ताकतों ने वैश्विक व्यवस्था को पुनर्निधारित करने में ‘अत्यधिक प्रभाव’ का प्रयोग किया था, वह अब बीत चुका है इसलिए भारत और दक्षिण कोरिया की इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से योगदान करने की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही है। दो दिवसीय यात्रा पर यहां आए जयशंकर ने ‘कोरिया नेशनल डिप्लोमेटिक अकादमी’ में अपने संबोधन में कहा कि कोरिया गणराज्य के साथ भारत की साझेदारी अधिक अनिश्चित और अस्थिर दुनिया में व्यापक प्रमुखता प्राप्त कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्धारण में सक्रिय रूप से योगदान देने के प्रति भारत और दक्षिण कोरिया की जिम्मेदारी बढ़ रही है। वह युग जब कुछ शक्तियों ने उस प्रक्रिया पर असंगत प्रभाव डाला था, अब बीत चुका है।” जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद या सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार का मुकाबला करना या वास्तव में समुद्री सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करना, दोनों देशों के लिए मौलिक रूप से मायने रखता है।
उन्होंने कहा, हिंद-प्रशांत की अवधारणा पिछले कुछ दशकों में भू-राजनीतिक बदलावों के परिणामस्वरूप उभरी है। उन्होंने कहा, ‘‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार, निवेश, सेवाओं, संसाधनों, लॉजिस्टिक्स और प्रौद्योगिकी के मामले में भारत की हिस्सेदारी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इस क्षेत्र की स्थिरता, संरक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हमारी प्रतिद्धता वैश्विक भलाई के प्रति है, ठीक उसी तरह जैसे वैश्विक भलाई करना हमारा कर्तव्य है।” जयशंकर ने कहा कि अपनी क्षमता का एहसास करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ाएं।
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