
सन् 1990 में जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो अमेरिका को महाराजा बनने का मौका मिल गया। पिछले करीब कई दशकों से अमेरिका, पश्चिमी देशों का लीडर बना हुआ है। लेकिन अब लगता है कि उसका सिंहासन डोलने लगा है। अमेरिका के आधिपत्य में दुनिया के कई देशों ने भी समृद्धशीलता का आनंदा उठाया। वहीं कुछ लोग अब यह सवाल पूछने से भी नहीं हिचक रहे हैं कि क्या वाकई साल 1991 से विश्व मे हो रही आर्थिक तरक्की के लिए सिर्फ अमेरिका को ही श्रेय मिलना चाहिए। अब रूस और यूक्रेन की जंग के बाद तो ऐसा लगने लगा है कि अंकल सैम का सुपरपावर वाला दर्जा खतरे में आ गया है। इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह से राजनीति के समीकरणों को बदलकर रख दिया है।
हर जगह अमेरिका : पिछले तीन दशकों में अमेरिकी कूटनीति ने ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ के साथ आगे बढ़ने में यकीन किया। हथियारों, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अमेरिका की कॉरपोरेट लॉबी ने ऐसे तरीके निकाले जिससे इसने दूसरे देशों पर अपना दबदबा कायम रखा। रूस और यूक्रेन की जंग सिर्फ अमेरिका की अगुवाई वाले नाटो के पूर्वी यूरोप में होने वाले विस्तार को परखने के लिए नहीं है बल्कि यह उस नीति को भी दर्शाती है जो दबाव से जुड़ी है। पिछले दो दशकों में रूस ने सोवियत जमाने से आगे निकलकर खुद को एक ताकतवर देश के तौर पर स्थापित किया। लगातार रूस ने अपील की कि पश्चिमी देश उसकी मौजूदगी को स्वीकार करें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सामाजिक और आर्थिक तौर पर अब रूस के नागरिकों को शायद इस बात से फर्क भी नहीं पड़ता है।
ट्रंप से कितने अलग बाइडेन : यूक्रेन की जंग ने साबित कर दिया है कि आधा विश्व नाटो के साथ नहीं है। अमेरिका की अगुवाई वाले विश्व को अब यह समझना होगा कि उनका एकाधिकार और राज करने की नीति अब काम नहीं आएगी। साल 2020 में जब जो बाइडेन अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो सब यह देखना चाहते थे कि वह डोनाल्ड ट्रंप से कितने अलग साबित होंगे। ऐसा कुछ नहीं हुआ और विशेषज्ञों की मानें तो वह ट्रंप से ज्यादा गलतियां कर रहे हैं।
सीरिया में जहां बाइडेन प्रशासन आईएसआईएस को नई जिंदगी देने में लगा है तो पाकिस्तान पर उसका रवैया ही बदल गया है। पाकिस्तान को उसने 450 मिलियन डॉलर की मदद दी तो वहीं एफ-16 को अपग्रेड करने का भी फैसला किया। जानकारों की मानें तो यूक्रेन और रूस के बीच जारी जंग ने अमेरिका की इमेज को कमजोर किया। वह इसका हर्जाना पाकिस्तान के साथ करीबी बढ़ाकर करना चाहता था। साथ ही उसे लगने लगा था कि चीन और रूस की करीबियों को अगर नजरअंदाज करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता है। पाकिस्तान पर चीन के असर को कम करने के मकसद से उसने वह किया जो कभी किसी ने नहीं सोचा था।
सऊदी अरब और यूएई, रूस के साथ : सऊदी अरब और यूएई जो हमेशा से अमेरिका के करीबी रहे, उन्होंने भी अब इससे किनारा करना शुरू कर दिया है। ये दोनों देश जो ओपेक के सदस्य हैं, अब रूस के करीब हो रहे हैं। बाइडेन की अपील को अनसुना करके, ओपेक ने तेल के उत्पादन में 20 लाख बैरल की कटौती का ऐलान कर दिया। बाइडेन जो अमेरिका को महंगाई से राहत दिलाना चाहते थे और पेट्रोल की कीमतों को कम करना चाहते थे, उनके लिए ओपेक का ऐलान बड़ा झटका था। माना जा रहा है कि इस ऐलान के पीछे रूस का हाथ हैं। मध्यावधि चुनाव से पहले बाइडेन को समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करें। चीन पहले ही अमेरिका के असर को ज्यादा तवज्जो नहीं देता है।
Home / News / तो क्या अमेरिका से छिन जाएगा सुपरपावर का दर्जा, रूस यूक्रेन युद्ध से हिल गई ‘अंकल सैम’ की सल्तनत!
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