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बूढ़ा किसान कोर्ट के बाहर इंतजार में…CJI सूर्यकांत ने सुनाई वो कहानी, कहा-इससे अदालतों पर भरोसा खत्म


मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि मुकदमेबाजी की ज्यादा ऊंची लागत और अदालती कार्यवाही में लंबी देरी आम नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच में बाधा बन रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक गरिमा की रक्षा के लिए न्याय सुलभ, समयबद्ध और मानवीय होना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने हाल ही में कहा कि अदालतों में देरी और मुकदमेबाजी की बढ़ती लागत भारत की न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं और न्याय की असली कसौटी कानूनी सिद्धांत नहीं बल्कि आम लोगों का दैनिक अनुभव है, जिन्हें अदालतों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ओडिशा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में बोलते हुए उन्होंने यह बात कही। विषय था-आम आदमी के लिए न्याय सुनिश्चित करना: मुकदमेबाजी की लागत और देरी को कम करने की रणनीतियां।
जस्टिस सूर्यकांत ने सुनाई बूढ़े किसान की कहानी – बॉर एंड बेंच और LAWCHAKRA पर छपी स्टोरी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्याय का अर्थ तभी है जब वह आसानी से सुलभ, किफायती, पूर्वानुमानित और मानवीय हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नागरिक, विशेषकर गरीब और कमजोर वर्ग, वास्तव में व्यवस्था का अनुभव कैसे करते हैं। अपने वकीली करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने एक निजी घटना साझा की, जिसमें उन्होंने एक बुजुर्ग किसान को अदालत के बाहर दोपहर तक इंतजार करते देखा, क्योंकि उस किसान का मामला सुनवाई सूची में बहुत नीचे था। मैंने चिंता से उनसे पूछा-बाबा, आप अब भी क्यों इंतजार कर रहे हैं? आज आपका मामला शायद न सुना जाए। इस पर किसान फीकी मुस्कान के साथ बोले-मैं जल्दी घर चला गया तो सामने वाला समझेगा कि मैंने हार मान ली है।
…तो अदालत में जनता का भरोसा खत्म – जस्टिस सूर्यकांत ने कहा-किसान के लिए देरी महज एक आंकड़ा नहीं थी। यह उनकी गरिमा का धीरे-धीरे हनन था। उन्होंने समझाया कि अदालती कार्यवाही में लगने वाली लंबी अवधि और संख्या से अधिक कागजी कार्रवाई लोगों को पीड़ा पहुंचाती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह की देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करती है, जो जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है। जब न्याय धीमा या बहुत महंगा हो जाता है, तो यह वादा कमजोर हो जाता है। कानून का शासन धीमा या खर्चीला होने पर गरिमा का अधिकार धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि लंबी प्रक्रियाएं धीरे-धीरे अदालतों में जनता के विश्वास को खत्म कर देती हैं।