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ईरान की मोजैक रणनीति क्या है? 4 दिन के युद्ध में ही हांफने लगा अमेरिका, ट्रंप के लिए ‘नरक’ बन रहा शिया देश


तालिबान अगर 20 साल बाद की लड़ाई के बाद भी जिंदा रहा तो उसके पीछे उसकी रणनीति और अफगानिस्तान के भौगोलिक हालात थे। ईरान भी अमेरिका के लिए ऐसी ही चुनौती पेश करने वाला है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में अपनी सेना भेजने की बात से इनकार नहीं किया है। लेकिन यकीन मानिए अगर अमेरिकी सैनिक ईरान पहुंचते हैं तो वियतनाम और अफगानिस्तान की तरह ही उसे जलील होकर बाहर निकलना पड़ सकता है।
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने अपनी डिफेंस स्ट्रैटजी में एक बड़ा बदलाव किया है। उसने डिसेंट्रलाइज़्ड यानि विकेंद्रीकरण मोजेक डिफेंस डॉक्ट्रिन को पूरी तरह से लागू कर दिया है। इस स्ट्रैटजी के तहत IRGC के प्रांतीय कमांडरों को पूरी आजादी दे दी गई है। यानि उन्हें किसी तरह का ऑपरेशन चलाने के लिए अब केन्द्रीय सैन्य नेतृत्व की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सेन्ट्रल कमांड लाइन पर हमला किया है जिसके बाद मोजेक डॉक्ट्रिन को लागू किया गया है।
अमेरिका और इजरायल ने ईरान की केन्द्रीय लीडरशिप, सैन्य नेतृत्व, हथियार भंडार पर हमले किए हैं। उसके इलेक्ट्रॉनिक युद्ध ने ईरान के कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर दिया है। केन्द्रीय नेताओं को मारा जा रहा है। इसीलिए ईरान में प्रांतीय सैन्य अधिकारियों को अपने हिसाब से युद्ध लड़ने के अधिकार दे दिए गये हैं, ताकि उन्हें कोई कदम उठाने के लिए बार बार इजाजत नहीं लेनी पड़े।
मोजेक डिफेंस सिस्टम अफरातफरी के हालात में निपटने के लिए बनाया गया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने 1 मार्च को शेखी बघारते हुए कहा था कि ईरान अब तय करेगा कि यह लड़ाई “कब और कैसे” खत्म होगी।
मोजेक डिफेंस युद्ध में कैसे काम करता है? – इस रणनीति के तहत IRGC को 31 अलग अलग यूनिट्स में बांटा गया है। एक तेहरान के लिए और बाकी 30 अलग अलग प्रांतों के लिए। हर यूनिट के कमांडर के पास टैक्टिकल शक्ति होगी और वो अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा। ये कमांडर खुद तय कर सकते हैं कि उन्हें मिसाइस दागना है या ड्रोन। गुरिल्ला युद्ध करना है या फिर कैसे युद्ध लड़ना है। उन्हें किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी।
ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और रेगिस्तानों को युद्ध लड़ने का नया सेंटर बनाया गया है। ये पूरी तरह से गुरिल्ला युद्ध है जैसा तालिबान ने अफगानिस्तान में किया था। जैसा वियतनाम में हुआ था। ईरान की भौगोलिक स्थिति भी काफी मुश्किल है। रेगिस्तान और पहाड़ दोनों मौजूद हैं। इसे डिफेंस इन डेप्थ कहा जाता है। ये रणनीति हमलावरों की लड़ने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करता है। ये युद्ध को लंबा खींचता है।