
अमेरिका ने वेनेजुएला पर नियंत्रण कर लिया है। इससे दुनिया के तेल भंडार पर उसका कब्जा हो गया है। यह कदम चीन और ईरान के लिए चिंता का विषय है। रूस का गुस्सा यूक्रेन पर निकल सकता है। भारत और चीन को मिलकर अमेरिका का सामना करना होगा। बहुध्रुवीय दुनिया के लिए ब्रिक्स देशों को संगठित होना होगा।
आप सुन रहे होंगे कि अब वेनेजुएला का क्या होगा ? तो पहले यह सोचिए कि बशर अल असद के बाद सीरिया का क्या हुआ? लीबिया का मुआम्मर गद्दाफी, इराक का सद्दाम हुसैन, वियतनाम आशीष शुक्ला का डाइम, पनामा का नोरेगा और ईरान का मोसादेघ (Mossadegh) के बाद क्या हुआ? इनके तख्ते भी तो अमेरिका ने ही पलटे थे।
अमेरिकी दुष्प्रचार । आपको यह भी बताया जा रहा होगा कि निकोलस मादुरो अच्छे व्यक्ति नहीं है। नशे के धंधे में सने थे। नार्को टेररिजम के सरगना थे। मगर सरगना तो होंडुरास के पूर्व राष्ट्रपति बुआन ओस्लैंडो हनडिज (Juan Orlando Hernandez) भी है, जिन्हें पिछले महीने ही डोनाल्ड ट्रंप ने क्षमादान दिया है। हांडेज को अमेरिकी कोर्ट ने 45 साल की सजा सुनाई थी। उन पर 400 टन कोकेन लाने का आरोप था।
ट्रंप की मनमानी। क्या वेनेजुएला से अमेरिका को ख़तरा था? क्या पकड़े जाने के कुछ घंटे पहले तक मादुरो ट्रंप के सामने गिड़गड़ा नहीं रहे थे कि वह समझौता चाहते हैं। क्या अमेरिकी कांग्रेस ने इस ख़तरे को सही मानकर ट्रंप को अनुमति दी? क्या UN ने इसका अनुमोदन किया ?
ईरान का पहलू । ट्रंप स्पष्ट कर चुके हैं कि वेनेजुएला को अस्थायी रूप से अमेरिका चलाएगा। दुनिया में वेनेजुएला से ज्यादा तेल किसी और मुल्क के पास नहीं है। अब यह अमेरिका का हो चुका है। इससे चीन के सीने पे सांप लोट रहा है क्योंकि वेनेजुएला का सबसे बड़ा तेल का ग्राहक चीन ही है। ईरान की तो रातों की नींद ही उड़ गई होगी। क्या अगला नंबर उसका है? वेनेजुएला पर यह कार्रवाई इसलिए भी हुई है कि अगर ईरान होरमुज (Hormuz) खाड़ी वाला समुद्री मार्ग बंद करता है तो अमेरिका पर फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि दुनिया में सबसे अधिक तेज भंडार वाला देश अब उसके नियंत्रण में है।
सेना किसके साथ। अब सवाल है कि क्या अमेरिका से वेनेजुएला संभलेगा? अफगानिस्तान तो उससे संभला नहीं। वेनेजुएला का भूगोल भी सपाट नहीं है। गुरिल्ला युद्ध लंबा खिंच सकता है। देखना यह भी होगा कि वेनेजुएला की सेना किस तरफ झुकती है।
भारत पर नजर । भारत का वेनेजुएला से ज्यादा नाता पिछले एक-दो दशक से नहीं रहा है। मगर ऐसे छोटे मुल्कों और ग्लोबल साउथ, जिसके मुखिया बनने का सपना भारत देख रहा है, उनकी नजर हमारे अगले कदम पर होगी। अमेरिका ने वेनेजुएला में अंतरराष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ा दी हैं। ऐसे में भारत तटस्थ रहकर अपना टैरिफ भले कम करवा ले, लेकिन उस पर भरोसा कम होगा।
पश्चिम एशिया में क्या होगा। – जेलेंस्की की अब खैर नहीं। अमेरिका के प्रति रूस का गुस्सा अब यूक्रेन पर निकलेगा। भारत और चीन शायद और करीब आ जाएं। ट्रंप चाहते हैं कि तेल बिके तो अमेरिकी डॉलर में ही बिके। तेल का व्यापार दूसरी मुद्रा में होने लगा तो डॉलर का दबदबा घटेगा और अमेरिका का भी। इसलिए अमेरिका आगे पश्चिम एशिया पर भी नियंत्रण बढ़ाएगा। इस राह में ईरान बाधा है। वह सिर्फ तेल के हिसाब से ही अहम नहीं, भारत, चीन और रूस का व्यापार मार्ग भी है।
संगठन में शक्ति । अमेरिका को जो देश झुका सकता है, उसी के आगे वह झुकता है। यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस ने यही किया। चीन ने जब अमेरिकी टैरिफ के जवाब में जब रेयर अर्थ की सप्लाई बंद करने की धमकी दी तो ट्रंप रास्ते पर आए। भारत 50% टैरिफ झेल रहा है, इसके बावजूद अमेरिका के साथ सौदे की बातचीत चल रही है। मुश्किल ये है कि तीनों देशों के लिए अमेरिका से अलग-थलग होना आसान नहीं है। मगर ब्रिक्स में शामिल इन तीनों देशों को तय करना पड़ेगा कि कल दुनिया में एक महाशक्ति की चले या वह बहुध्रुवीय हो। संगठित होने में ही उनका भला है।
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