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भारत बनेगा पश्चिमी देशों की हथियार फैक्‍ट्री? ट्रंप ने दी NATO से न‍िकलने की धमकी, बन रहा दुर्लभ मौका


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (NATO) से निकलने की धमकी दी है। उन्होंने द टेलीग्राफ को दिए गये इंटरव्यू में कहा है कि वो NATO से बाहर निकलने पर विचार कर रहे हैं। ट्रंप इसलिए नाराज हैं क्योंकि ईरान के खिलाफ लड़ाई में उन्हें नाटो देशों का साथ नहीं मिला है जबकि नाटो के लिए सबसे ज्यादा फंड अमेरिका देता है। ट्रंप ने कहा ‘हां, मैं तो कहूंगा कि इसपर दोबारा विचार करने की गुंजाइश ही नहीं है। मुझे नाटो कभी पसंद नहीं रहा है और मुझे हमेशा से पता था कि वो सिर्फ कागजी शेर हैं और वैसे भी ये बात पुतिन जानते हैं।’
ट्रंप अगर नाटो से अलग होने का फैसला करते हैं तो इससे यूरोप की सुरक्षा अस्थिर हो जाएगी। ये ग्लोबल डिफेंस मानचित्र को पूरी तरह से बदल देगा और भारत के लिए यहां से एक दुर्लभ रणनीतिक फायदे की शुरूआत हो सकती है। भारत और यूरोपीय देशों ने इसी साल ऐतिहासिक व्यापार समझौता किया है और नाटो का कमजोर होने का मतलब साफ है कि यूरोपीय देश नये साझेदारों की तलाश करेंगे। भारत के लिए ये स्थिति सबसे बेहतरीन होगी जब यूरोपीय देशों की जरूरत और भारत के लिए अवसर एक चौराहे पर आमने-सामने आ जाएं।
अमेरिका के बिना कैसे हो सकती है यूरोप की सुरक्षा? – दशकों से यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य शक्ति पर निर्भर रहा है। यूरोप, अमेरिका के खुफिया नेटवर्क और औद्योगिक सप्लाई चेन पर निर्भर रहा है। NATO से US का बाहर निकलने का मतलब है कि यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को और नहीं टाल सकता है। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए पैसों का खर्च बढ़ाना होगा। यूक्रेन युद्ध ने पहले ही यूरोप की सुरक्षा को खतरे में डाल रखा है और अगर अमेरिकी सुरक्षा हटता है तो स्थिति और अलग होगी। इसीलिए यूरोप की असली चुनौती ऐसे साझेदार खोजने में है जो उन्नत क्षमता और भू-राजनीतिक स्थिरता दोनों प्रदान कर सकें।
भारत-EU समझौता बिल्कुल सही समय पर हुआ – मौजूदा हालात को देखें तो जनवरी में यूरोपीय संघ के साथ भारत की रक्षा और सुरक्षा साझेदारी दूरदर्शी लगती है। यह समझौता सिर्फ लेन-देन वाले खरीदार-विक्रेता के रिश्ते से हटकर, एक गहरे औद्योगिक सहयोग की ओर एक बदलाव का संकेत है। इसके मूल में सह-विकास, सह-उत्पादन और सप्लाई चेन के एकीकरण का विचार है। इसके तहत एक मजबूत उद्योग का निर्माण शामिल है।
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस साझेदारी को एक “फोर्स मल्टीप्लायर” (ताकत बढ़ाने वाला) बताया था, खासकर यूरोप की “ReArm” (फिर से हथियार जुटाने) की महत्वाकांक्षाओं को लेकर। उनका तर्क है कि भारतीय विनिर्माण को यूरोपीय सप्लाई चेन में एकीकृत करने से एक भरोसेमंद और मजबूत रक्षा इकोसिस्टम बनाने में मदद मिल सकती है। यानि जब यूरोप अमेरिका से बाहर देखने के लिए मजबूर दिख रहा तो भारत उसी समय खुद के विस्तार के लिए उसके सामने खड़ा है। ये मौका अत्यंत दुर्लभ है।
नाटो से अमेरिका निकलेगा तो भारत के हाथ होगा मौका? – ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो यूरोप के साथ भारत के रक्षा संबंध मजबूत रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली जैसे देशों ने एडवांस सिस्टम और प्लेटफॉर्म भारत को दिए हैं। लेकिन अब यह समीकरण बदल रहा है। हाल के वर्षों में भारतीय निर्यात, विशेष रूप से गोला-बारूद और विस्फोटक में जबरदस्त उछाल आया है। भारत, यूरोपीय देशों को गोला बारूद भंडार को एतिहासिक तौर पर भर रहा है। भारत अब खरीददार की भूमिका से एक विनिर्माण केंद्र और एक तकनीकी साझेदार बनना चाहता है।
इसीलिए यूरोप अब भारत को सिर्फ एक ग्राहक के तौर पर नहीं बल्कि अपनी रक्षा क्षमता में योगदान देने वाले एक साझेदार के तौर पर देखने को तैयार है। इसीलिए ये समय काफी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा भारत के रक्षा निर्माण क्षेत्र में एक खामोश बदलाव आया है। पिछले एक दशक में घरेलू उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है और निर्यात में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। लेकिन अगले चरण के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण की जरूरत है। यहीं पर यूरोप की भूमिका अहम हो जाती है। यूरोपीय बाजारों, पूंजी और तकनीक तक पहुच से भारतीय कंपनिया मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ सकती है। सिर्फ पुर्जे बनाने वाली कंपनियों से सिस्टम इंटीग्रेटर बनने की दिशा में बढ़ सकती हैं।