
भारत ने फिलीपींस की संप्रभुता का समर्थन किया तो चीन तिलमिला उठा। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने फिलीपिंस के अपने समकक्ष एनरिक मानलो से बातचीत में दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के दावों के प्रति समर्थन जताया। इस पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियां ने आपत्ति जता दी।
भारत हमेशा ‘जियो और जीने दो’ की नीति में विश्वास करता रहा है। हम सिर्फ अपना फायदा नहीं देखते हैं बल्कि दूसरों के हितों का भी सम्मान करते हैं। ऐसे में किसी तीसरे को मिर्ची लगे तो लगे। भारत ने अब इसकी फिक्र करनी भी छोड़ दी है। तभी तो जब फिलीपींस की संप्रुभता की बात आई तो भारत बेधड़क उसके साथ खड़ा हो गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कहा कि फिलीपींस अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के लिए जो भी कदम उठाता है, वो सराहनीय है। इस पर चीन तिलमिला उठा है। उसने भारत को ‘तीसरा पक्ष’ बताते हुए कहा कि हमारे विवादों में किसी को दखल देने का अधिकार नहीं है।
जयशंकर के बयान से चिढ़ा चीन – दरअसल, मामला दक्षिण चीन सागर (एससीएस) में चीन-फिलीपींस के बीच बढ़ते तनाव का है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर मंगलवार को फिलीपींस की राजधानी मनीला में थे। वहां उन्होंने अपने समकक्ष एनरिक मानलो के साथ बैठक के बाद फिलीपींस की संप्रभुता को बनाए रखने के प्रयासों का समर्थन किया। इस बैठक से एक दिन पहले फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर में चीन की ‘आक्रामक कार्रवाइयों’ के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए चीनी राजदूत को तलब किया था। चीन दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर अपना दावा करता है। भारतीय विदेश मंत्री के फिलीपींस का समर्थन किए जाने से चीन इसलिए भी तिलमिला उठा क्योंकि पिछले हफ्ते अमेरिका ने भी फिलीपींस के वैध समुद्री अभियानों के खिलाफ चीन की ‘खतरनाक’ कार्रवाइयों की निंदा की थी।
जयशंकर ने चीन को याद दिलाई वो बात – जयशंकर ने नियम आधारित व्यवस्था के सख्त पालन का आह्वान किया और ‘फिलीपींस को उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखने के लिए भारत के समर्थन’ को दोहराया। उन्होंने समुद्र के संविधान के रूप में यूएनसीएलओएस (संयुक्त राष्ट्र समुद्र विधि सम्मेलन), 1982 के महत्व बताते हुए सभी पक्षों से इसका अक्षरशः पालन करने की अपील की। चीन इस पर भी चिढ़ गया जबकि इस बार भारत और फिलीपींस के विदेश मंत्रियें ने जून 2023 में हुई बैठक के बाद दिया बयान नहीं दुहराया। उस वक्त तो फिलीपींस के साथ विवाद में चीन के विस्तारवादी दावों का जोरदार खंडन किया गया था। तब दोनों विदेश मंत्रियों ने चीन से 2016 के कानूनी रूप से बाध्यकारी फैसले का पालन करने की अपील की थी। वह पहला वक्त था जब भारत ने दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर चीन के खिलाफ फिलीपींस का साथ दिया था। यूएनसीएलओएस मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने न केवल बीजिंग की नौ डैश लाइन को बल्कि फिलीपींस के समुद्री क्षेत्र में उसकी गतिविधियों को अवैध बताया था।
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