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ईरान युद्ध से पुतिन को म‍िला यूक्रेन जीतने का खुराक, भारत से लेकर चीन तक पहुंच रहे रूसी तेल टैंकर, ट्रंप फेल


ईरान युद्ध की वजह से तेल से भरे रूसी टैंकर दनादन भारत और चीन पहुंच रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले एक साल से रूसी तेल निर्यात रोकने को लेकर जितने भी दांव आजमाए थे वो सारे के सारे फेल हो चुके हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और खाड़ी देशों से आपूर्ति बाधित होने के कारण भारतीय रिफाइनरियों ने फिर से रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ाई है। अमेरिका ने रूसी तेल से एक महीने के लिए प्रतिबंध हटा दिया है और जिस तरह के हालात दिख रहे हैं लगता यही है कि रूसी तेल से प्रतिबंध आने वाले वक्त में भी अमेरिका को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार पर नजर रखने वाली एजेंसी केप्लर के एक मैप से पता चलता है कि रूसी तेल टैंकर किस तरह से अलग अलग देशों में तेल सप्लाई कर रहे हैं। जो मैप आप देख रहे हैं उसमें हरे रंग में जो आइकन दिख रहे हैं वो रूसी तेल टैंकर हैं जो अलग अलग इलाकों में दिखाई दे रहे हैं। वे रूसी ‘यूराल्स क्रूड’ से भरे हुए तेल टैंकर हैं। कैप्लर के मुताबिक ये टैंकर मुख्य रूप से यूरोप और अन्य समुद्री मार्गों से होते हुए एशिया की तरफ बढ़ रहे हैं।
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद रूसी तेल निर्यात में इजाफा – कच्चे तेल की मांग में आई तेजी से मॉस्को को जबरदस्त फायदा हुआ है। 20 मार्च को रूसी कच्चे तेल की कीमतें 80 फीसदी बढ़कर 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। रूस के लिए इस अतिरिक्त कमाई का मतलब है एनर्जी से होने वाली ज्यादा आमदनी और उसके ‘नेशनल वेल्थ फंड’ का और मजबूत होना। जानकारों का अनुमान है कि अगर तेल की औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो रूस को हर दिन 150 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा की अतिरिक्त कमाई होगी। मार्च के आखिर त रूस को 4-5 अरब डॉलर की अतिरिक्त कमाई होने का अनुमान है।
इसी तरह रूसी LNG की मांग बढ़ गई है और यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतें 850 अमेरिकी डॉलर प्रति हजार क्यूबिक मीटर तक पहुंच गई हैं। हालाँकि कच्चे तेल के विपरीत दुनिया के देशों के पास कुछ महीनों से ज्यादा गैस स्टोर करने की क्षमता नहीं होती है। इसके अलावा LNG के उत्पादन और ट्रांसशिपमेंट की प्रक्रिया भी तेल की प्रक्रियाओं से काफी अलग होती हैं। LNG आमतौर पर लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट के तहत बेची जाती है। जिसका मतलब है कि पहले से मौजूद समझौतों को देखते हुए रूस एशियाई देशों से बढ़ी हुई गैस की मांग को पूरी तरह से पूरा नहीं कर पाएगा। एशियाई देश अपनी लगभग 90 प्रतिशत LNG आपूर्ति के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर रहते हैं।