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चीन-रूस का बढ़ा प्रभाव तो भारत ने छोड़ दिया अपना एकमात्र विदेशी एयरबेस!


भारत ने पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन के शिनच्यांग प्रांत से लगते वखान कॉरिडोर से महज 20 किलोमीटर दूर स्थित इस एयरबेस को विकसित करने का काम नब्बे के दशक के आखिर में शुरू किया था।
ताजिकिस्तान के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते की मियाद खत्म होने पर भारत ने खामोशी से वहां के आयनी एयरबेस से अपनी मौजूदगी हटा ली। यह देश के बाहर भारत की इकलौती सैन्य मौजूदगी थी। ताजिकिस्तान का आयनी एयरबेस , जिसे गिसार मिलिट्री एयरोड्रोम भी कहा जाता है, कभी सोवियत संघ का सैन्य ठिकाना हुआ करता था। 1991 के बाद रूस के लिए उसका खर्च उठाना मुश्किल होता गया। तब रूस के विश्वस्त मित्र के रूप में भारत को आयनी एयरबेस विकसित करने की इजाजत मिल गई।
POK बॉर्डर से करीब: भारत ने पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन के शिनच्यांग प्रांत से लगते वखान कॉरिडोर से महज 20 किलोमीटर दूर स्थित इस एयरबेस को विकसित करने का काम नब्बे के दशक के आखिर में शुरू किया। भारतीय वायुसेना और बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) ने 7 करोड़ डॉलर के निवेश से एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम और फ्यूल डिपो के साथ-साथ 3,200 मीटर के रनवे को भी स्तरीय बनाया।
लड़ाकू विमानों की तैनाती: एक समय भारत ने यहां Su-30 MKI फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर भी तैनात कर रखे थे। यही नहीं, भारत ने ताजिकिस्तान के फारखोर में एक सैन्य अस्पताल भी बनवाया। मकसद तालिबान के खिलाफ लड़ने वाले ग्रुपों के गठबंधन नॉर्दर्न अलायंस के सदस्यों का इलाज करना ही नहीं, मध्य एशिया के इस गरीब इलाके में सॉफ्ट पावर प्रदर्शित करना भी था। 2021 में काबुल पर तालिबान की सत्ता फिर से स्थापित होने के बाद वहां फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए भी इस एयरबेस का इस्तेमाल किया गया था।
तालिबान से बढ़ती करीबी: इस सामरिक एयरबेस को छोड़ने के फैसले के पीछे ताजिकिस्तान पर बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव की भूमिका मानी जा रही है। वैसे, यह बात भी है कि आयनी एयरबेस की बड़ी भूमिका तालिबान के खिलाफ नॉर्दर्न अलायंस को मजबूती देने में थी। इससे अलग होने का फैसला तालिबान से भारत की बढ़ती करीबी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, मध्य एशिया में भारत के बढ़ते प्रभाव से रूस को दिक्कत नहीं है। उसने न केवल इस क्षेत्र में भारत की अहम भूमिका को तवज्जो दी है बल्कि शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की सदस्यता के सवाल पर भी उसका समर्थन किया है।
चीन की बढ़ती पैठ: दूसरी तरफ पेइचिंग बेल्ट एंड रोड इनीशटिव (BRI) के जरिए इन्फ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी में जबर्दस्त निवेश करके मध्य एशिया में अपनी आर्थिक पैठ मजबूत करता जा रहा है। चीन ने ताजिकिस्तान के मुर्गोब डिस्ट्रिक्ट में सैन्य अड्डा स्थापित कर इस इलाके में अपना सैन्य प्रभाव बढ़ाने के लिए SCO का भी इस्तेमाल किया है। यही नहीं, वह मध्य एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय स्तर पर नियमित युद्धाभ्यास करता और इन देशों को सैन्य तकनीक मुहैया कराने के साथ-साथ इनकी सेनाओं को प्रशिक्षित भी करता है।
क्रिटिकल मिनरल्स पर निगाहें: हाल के वर्षों में मध्य एशिया में वैश्विक ताकतों की दिलचस्पी इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि क्रिटिकल मिनरल्स और एनर्जी का एक वैकल्पिक स्रोत तलाशकर वे चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती हैं। दूसरी ओर, यूक्रेन पर रूसी हमले और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के मद्देनजर मध्य एशियाई देशों में भी क्षेत्रीय स्थिरता, संप्रभुता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, तुर्किये, चीन और खाड़ी देशों के साथ संपर्क बढ़ाने की प्रवृत्ति तेज होती दिख रही है।